वन्यजीव जंतु एवं जैव-विविधता

जैव-विविधता का अर्थ-

  • किसी क्षेत्र विशेष या प्राकृतिक प्रदेश में पाए जाने वाले जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों व सूक्ष्म जीवों की बहुलता जैव-विविधता कहलाती है।
  • जैव-विविधता शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है बायो का अर्थ जीव तथा डाइवर्सिटी का अर्थ विविधता है।
  • जैव-विविधता शब्द का प्रयोग वॉल्टर जी. रोजेन द्वारा वर्ष 1985 में किया गया।
  • e जैव-विविधता पौधों के प्रकार, प्राणियों तथा सूक्ष्म जीवों पर निर्भर रहता है।
  • पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवधारियों की परिवर्तनशीलता, एक ही प्रजाति और विभिन्न प्रजातियों में परिवर्तनशीलता तथा विभिन्न पारितन्त्रों में विविधता से सम्बन्धित होता है। जैव-विविधता एक सजीव सम्पदा है।
  • NOTE – विषुवत् रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर जैव-विविधता की मात्रा लगातार घटती चली जाती है। विषुवत् रेखा के निकटवर्ती वनों को “विषुवतीय वर्षा वन” के नाम से जाना जाता है। इनका विस्तार मुख्यतः – एशिया, अफ्रीका व दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप पर है।
  • दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में अमेजन नदी के विषुवतीय वर्षा वनों को ‘सेल्वास’ के नाम से जाना जाता है।
  • महाद्वीप के भागों की तुलना में समुद्र/महासागर में जैव-विविधता अधिक पाई जाती है।

जैव-विविधता को तीन स्तरों में समझा जा सकता है-

1. आनुवंशिक जैव-विविधता

  • जीन की संरचना में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाली विविधता आनुवंशिक जैव-विविधता कहलाती है, जैसे- एक ही माता-पिता की दो संतानों के मध्य की विविधता जीन की संरचना में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती है।
  • जीवन निर्माण के लिए जीन एक मूलभूत इकाई है। किसी प्रजाति में जीनों की विविधता ही आनुवंशिकी जैव-विविधता कहलाती है।
  • आनुवंशिकी जैव-विविधता में समान भौतिक लक्षण वाले जीवों के किसी समूह को प्रजाति कहा जाता है।
  • मानव आनुवंशिकी रूप में ‘होमोसेपियन’ प्रजाति समूह का है, जिसका कद, रंग तथा अलग-अलग दिखावट जैसे शारीरिक लक्षणों में भिन्नता पाई जाती है।
  • किसी भी प्रजाति के शारीरिक विकास में आनुवंशिक विविधता अनिवार्य है।
  • आनुवंशिकी जैव-विविधता में अन्तर निम्नलिखित कारणों से हो सकता है-
  • (a) एलील्स में भिन्नता (एक ही जीन का विभिन्न प्रारूपों में) पाया जाना।
  • (b) सम्पूर्ण जीन में विभिन्नता जिसमें किसी विशिष्ट अभिलक्षणों को निर्धारित करने वाले लक्षण प्रभावित होते है।
  • (c) गुणसूत्रों की संरचना में परिवर्तन आनुवंशिकी विभिन्नता प्रजाति विशेष को किसी विशिष्ट पर्यावरण के साथ अनुकूल परिस्थिति स्थापित करने में सहायता करती है। इस प्रजाति की उत्तरजीविता-दर में वृद्धि होती है और ऐसी स्थिति प्राकृतिक चयन को प्रभावित करते हैं।

2. प्रजातीय जैव-विविधता

  • जीव-जंतुओं की विभिन्न प्रजातियों के मध्य की जैव-विविधता जातिगत जैव-विविधता कहलाती है।
  • जैसे :- कुत्ते/बिल्ली की विभिन्न प्रजातियों के मध्य की विविधता।
  • प्रजातियों की जैव-विविधता, प्रजाति की समृद्धि, प्रकार और बहुलता से सम्बन्ध रखती है।
  • किसी क्षेत्र में प्रजातियों की संख्या अधिक तथा किसी में कम पाई जाती है। जिन क्षेत्रों में प्रजातीय जैव-विविधता अधिक पाई जाती है उन क्षेत्रों को ‘हॉट-स्पॉट’ कहा जाता है।
  • प्रजातियों की प्रचुरता प्रति इकाई क्षेत्र में रहने वाली प्रजातियों की कुल संख्या को प्रजातियों की प्रचुरता कहा जाता है।
  • प्रजातियों की एकरूपता इसका संबंध किसी क्षेत्र विशेष में प्रजातियों के आपेक्षित बाहुल्य या उनकी विविधता से होता है।
  • प्रजातियों की प्रभावितता किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाली अनेक प्रजातियों में से जिस प्रजाति की संख्या अन्यों की तुलना में अधिक हो वह प्रजाति प्रभावी मानी जाती है।

3. पारितंत्रीय जैव-विविधता

  • पारिस्थितिक तंत्रों में बदलाव के कारण उत्पन्न होने वाली विविधता पारिस्थितिक जैव-विविधता कहलाती है।
  • उदाहरण :- ध्रुवीय क्षेत्र के सफेद भालू व उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के काले भालू के मध्य की विविधता पारिस्थितिकी तंत्रों में बदलाव के कारण उत्पन्न होती है।
  • जीवमण्डल में एक साथ बहुत से पारिस्थिकी तंत्र पाए जाते हैं। पारिस्थितिकी तन्त्र में विभिन्न प्रकार के पौधों और जीव-जन्तुओं की अनेक प्रकार की प्रजातियाँ निवास करती है, जो एक दूसरे पर परस्पर निर्भर होती है और विभिन्न प्रकार के निवास स्थान में निवास करने के लिए अनुकूलित होती हैं।
  • पारिस्थितिकी तन्त्र में निवास करने वाली प्रजातियों के लिए उपयुक्त पर्यावरण की विभिन्न परिस्थितियाँ, विभिन्न पोषण स्तर, आहार जालों की संख्या, तन्त्र के भीतर ऊर्जा और पोषक तत्त्वों के पुनर्चक्रण को बनाए रखता है।

जैव-विविधता के प्रकार –

अल्फा जैव-विविधता – स्थानीय स्तर पर पाई जाने वाली जीव-जंतुओं एवं पादपों की विविधता अल्फा जैव विविधता कहलाती है, जैसे-पश्चिमी राजस्थान या थार के मरुस्थल में पाई जाने वाली जैव-विविधता।

बीटा जैव-विविधता-   किसी राष्ट्र या अपेक्षाकृत बड़े क्षेत्र की जैव-विविधता बीटा जैव-विविधता कहलाती है, जैसे- भारत, चीन, जापान एक ही महाद्वीप के भाग है, लेकिन इन देशों में जैव-विविधता अलग-अलग है।

गामा जैव-विविधता – वैश्विक जैव-विविधता को गामा जैव-विविधता के नाम से जाना जाता है। विभिन्न राष्ट्रों या विस्तृत भौगोलिक प्रदेश की जैव-विविधता गामा जैव-विविधता कहलाती है, जैसे- भूमध्य या विषुवतीय वर्षा वन क्षेत्र की जैव-विविधता, मरुस्थलीय प्रदेश या सहारा मरुस्थल की जैव-विविधता, टैगा प्रदेश की जैव-विविधता।

जैव विविधता का संरक्षण

अंतःस्थाने संरक्षण(IN-SITU CONSERVATION) – जीव-जंतुओं व पेड़-पौधों को उनके प्राकृतिक आवास में रहते हुए संरक्षण प्रदान करना अंतः स्थाने संरक्षण कहलाता है।

उदाहरण – राष्ट्रीय पार्क,अभयारण्य, बायो स्फीयर रिजर्व।

बहिः स्थाने संरक्षण(EX-SITU CONSERVATION)

जीव-जंतुओं व पेड़-पौधों को उनके प्राकृतिक आवास के बाहर लाकर संरक्षण प्रदान करना बर्हिः स्थाने संरक्षण कहलाता है।

उदाहरण – जन्तुआलय, बीज बैंक इत्यादि।

अत्यधिक जैव-विविधता का क्षेत्र –

उष्ण कटिबंधीय वर्षा वन’ 

जैव-विविधता उष्ण कटिबंधीय वर्षा वन में सर्वाधिक पाई जाती है। ये वन विश्व के 13 प्रतिशत भाग पर विस्तृत है लेकिन यहाँ विश्व की 50 प्रतिशत से अधिक ज्ञात प्रजातियाँ विद्यमान है। यहाँ वर्षा की मात्रा अधिक होने के कारण जैव-विविधता का विकास अधिक हुआ है। इसे जैव-विविधता का भण्डार गृह कहा जाता है।

2. मूंगे की चट्टान / प्रवालभित्ति

  • महाद्वीपीय मग्नतटों पर सर्वाधिक रंग-बिरंगे, सर्वाधिक जैव-विविधता से युक्त चूना पत्थर (कैल्सियम कार्बोनेट) कंकड़-पत्थर, मिट्टी इत्यादि से निर्मित जीव व अजीव संरचनाओं को प्रवालभित्ति की संज्ञा दी जाती है।
  • विश्व की सबसे बड़ी प्रवालभित्ति ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी किनारे पर स्थित ग्रेट बैरियर रीफ है।
  • इसकी लम्बाई 1920 किमी. (1200 मील) है। विश्व के लगभग 110 देशों में प्रवालभित्तियाँ पाई जाती है लेकिन वर्तमान में 95 से अधिक देशों में प्रवालभित्तियाँ नष्ट हो चुकी है।

3. आर्द्रभूमियाँ

  • समुद्री तटीय क्षेत्रों में 6 मीटर तक की लहरों का क्षेत्र एवं भूमि के आंतरिक भागों में झीलों का क्षेत्र जहाँ जैव-विविधता प्रचुर मात्रा में पाई जाती है उसे आर्द्र भूमि कहा जाता है।
  • इन समुद्री तटीय आर्द्रभूमियों में मैंग्रोव वन पाए जाते हैं। मैंग्रोव से तात्पर्य ऐसे वृक्ष से है, जो जलमग्न होकर लवणीय पर्यावरण में अपना पोषण एवं विकास करते हैं।
  • सुंदर वन विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव हैं इसमें सुन्दरी वृक्ष की प्रधानता पाई जाती है। यह क्षेत्र गंगा व ब्रह्मपुत्र के डेल्टा क्षेत्र में भारत व बांग्लादेश में पाया जाता है।

4. उष्ण कटिबंधीय सागरीय क्षेत्र

यहाँ उच्च तापमान एवं उच्च वर्षा होती है। यहाँ अनेक नदियाँ अवसाद लाकर डालती है, इस क्षेत्र में समुद्री जीव-जंतु एवं वनस्पतियों के विकास की अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध है इसलिए जैव-विविधता अधिक है।

अधिक जैव-विविधता का क्षेत्र –

इसके अंतर्गत पश्चिमी यूरोप, मानसूनी प्रदेश व घास के मैदान सम्मिलित है

1.पश्चिमी यूरोप जलवायु प्रदेश – 

  • यहाँ शीतोष्ण महासागरीय जलवायु पाई जाती है।
  • यहाँ पछुआ पवनों के द्वारा वर्षा की मात्रा अधिक रहती है।
  • यहाँ शंकुधारी/कोणधारी वनों का विकास हुआ है यहाँ के प्रमुख वृक्षों में चीड़, देवदार, स्पूस, विलो, फर वॉलनट, मैपल आदि है |

2. मानसूनी प्रदेश

  • इन प्रदेशों में भारी वर्षा लेकिन ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है।
  • भारत के मालाबार तट एवं असम के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मानसूनी वनों का विकास अधिक हुआ है।
  • यहाँ पाए जाने वाले प्रमुख वृक्षों साल, सागवान, शीशम, पलाश, महुआ, जामुन, बरगद आदि के वृक्ष पाए जाते हैं।

3. घास के मैदान

इन मैदानों में मुख्य रूप से शीतोष्ण कटिबंधीय घासभूमियाँ प्रमुख हैं जिनमें प्रेयरीज, स्टेजपीज, डाउंस, वेल्ड, पंपास, केण्टरबरी आदि।

कम जैव विविधता का क्षेत्र –

उपध्रुवीय व मरुस्थलीय क्षेत्र

जीव-जंतुओं व वनस्पति के विकास की अनुकूल परिस्थितियाँ यहाँ अत्यन्त कम पाई जाती है क्योंकि यहाँ बर्फ की अधिकता रहती है इसके प्रमुख क्षेत्रों में उपध्रुवीय क्षेत्र एवं मरुस्थलीय क्षेत्र है।

निम्न जैव-विविधता का क्षेत्र –

 उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र

यहाँ तापमान के अत्यधिक कम रहने एवं बर्फ की अत्यधिक मात्रा से जीव-जंतुओं व पेड़-पौधों का विकास अत्यन्त कम हुआ है। इसके प्रमुख क्षेत्रों में उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र है।

 

जैव विविधता संरक्षण हेतु स्थल –

1. जैव विविधता तप्त स्थल

2. जैव-संरक्षित क्षेत्र

3. राष्ट्रीय उद्यान

4. वन्य जीव अभयारण्य, पक्षी अभयारण्य

5. आर्द्र भूमियाँ (Wet lands)

विश्व के जैव-विविधता के क्षेत्र –

संपूर्ण विश्व को 8 बड़े जैव-विविधता क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है-

1.अफ्रो-ट्रॉपिकल क्षेत्र

3.पिलेजिक क्षेत्र

4.अंटार्कटिक क्षेत्र

5.नेरेटिक क्षेत्र

6.नियो-ट्रॉपिकल क्षेत्र इण्डो-मलायन क्षेत्र

7ऑस्ट्रेलेशियन क्षेत्र

8.ओशिएनिक क्षेत्र

जैव-विविधता हॉट स्पॉट –

  • जैव-विविधता हॉट स्पॉट का नामकरण सर्वप्रथम ब्रिटिश
  • पारिस्थितिकीविद् नॉर्मन मायर ने वर्ष 1998 में किया था। इसके अनुसार ऐसे देश जहाँ आनुवंशिक व जातिगत जैव-विविधता (पौधों, जंतुओं एवं सूक्ष्मजीवों) प्रचुर मात्रा में पाई जाती है, उसे जैव-विविधता हॉटस्पाट कहते है।
  • जैव-विविधता हॉटस्पाट को मेगाडाइवरसिटी देश भी कहते हैं।
  • जैव-विविधता हॉट स्पॉट की अवधारणा यूनाइटेड किंगडम (U.R.) देश के विद्वान नॉर्मन मायर्स ने दी थी।

    जैव-विविधता हॉट-स्पॉट से तात्पर्य

    (i) ऐसे क्षेत्र जहाँ जैव-विविधता प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।

    (ii) उस क्षेत्र में जीव जंतुओं व पेड़ पौधों की कम से कम 1500 स्थानीय प्रजातियाँ पाई जानी चाहिए।

    (iii) उस क्षेत्र में जीव जंतुओं व पेड़ पौधों या जीव-जन्तुओं एक प्रजाति ऐसी पाई जानी चाहिए जो विश्व के और किसी भी भाग में नहीं पाई जाती हो।

    (iv) विश्व स्तर पर ऐसे देशों की संख्या 17 हैं।

  • प्रवालभित्ति/मूंगे की चट्टान –
  • महाद्वीपीय मग्नतटों पर सर्वाधिक रंग-बिरंगे सर्वाधिक रंग-बिरंगे सर्वाधिक जैव-विविधता से युक्त, चूने पत्थर (कैल्सियम कार्बोनेट) से निर्मित जीव व अजीव संरचनाओं को प्रवालभित्ति की संज्ञा दी जाती है।
  • 1.ग्रेट बैरियर रीफ – विश्व की सबसे बड़ी प्रवालभित्ति ऑस्ट्रेलिया देश के पूर्वी किनारे पर ग्रेट बैरियर रीफ है, इसकी कुल लंबाई = 1920 किमी. या 1200 मील है।
  • प्रवाल भित्ति/मूंगे चट्टान की निर्माण की दशाएँ –
  • प्रवालभित्तियों का निर्माण समुद्र के केवल महाद्वीपीय मग्नतट के क्षेत्र में होता है।
  • (i) यहाँ समुद्री लहरें भोजन लाने का कार्य करती है।
  • (ii) इस क्षेत्र में सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति के कारण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया सम्पन्न होती है।
  • (iii) इस क्षेत्र का ढलान कम होने के कारण आवासों का निर्माण आसानी से होता है।
  • 2.समुद्री जल का तापमान 18 से 27 डिग्री सेल्सियस के मध्य होना चाहिए।
  • 3.समुद्री जल की लवणता = 27 से 31 प्रति हजार ग्राम के मध्य होनी चाहिए।
  • 4.नदियों के मुहाने या डेल्टा क्षेत्र में प्रवालभित्तियों का विकास नहीं होता है।
  • विश्व स्तर पर जैव-विविधता का संरक्षण –
  • (1) स्टॉकहोम सम्मेलन इस सम्मेलन का आयोजन 5 जून, 1972 को किया गया। इसी कारण से 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह सम्मेलन स्वीडन देश की राजधानी स्टॉकहोम में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में पर्यावरण व जैव-विविधता के संरक्षण हेतु 25 बिन्दुओं पर चर्चा की गई। इस सम्मेलन को पर्यावरण का मैग्नाकार्टा कहा जाता है।
  • (2) मैन एण्ड बायोस्फीयर प्रोग्राम :- यह कार्यक्रम सन् 1973 में
  • यूनेस्को संस्था के द्वारा चलाया गया। इस कार्यक्रम के तहत विश्व स्तर पर विभिन्न देशों जैव-विविधता के संरक्षण हेतु बायो स्फीयर रिज़वों की स्थापना की गई। वर्तमान में भारत में 18 बायो स्फीयर रिज़र्व है।
  • प्रथम पृथ्वी सम्मेलन (1992, रियो डी जेनेरो-ब्राजील) –
  • (1) इस सम्मेलन के दौरान विश्व स्तर पर जैव-विविधता संबंधी पहली बार विस्तृत कानूनों का निर्माण किया गया।
  • (2) CBD (कन्वेंशन ऑन बायोलॉजीकल डाइवरसिटी)- इस संधि का आयोजन वर्ष 1992 में किया गया ताकि जैव-विविधता संबंधी कानूनों को लागू किया जा सकें।
  • (3) भारत में जैव-विविधता संबंधी कानूनों को लागू करने के लिए जैव-विविधता अधिनियम-2002 बनाया गया।
  • नागोया प्रोटोकॉल –
  • जैव विविधता में तेजी से आ रही गिरावट को रोकने के लिए सन् 1992 में अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता संहिता का निर्माण कर इसे लागू करने पर बल दिया गया। संहिता पर हस्ताक्षरकर्ता देशों ने वर्ष 2010 में जापान के नागोया शहर में आयोजित बैठक में इसे लागू किया जिसके तहत वर्ष 2020 तक विश्व के जंगलों, मूंगे की चट्टानों व अन्य जीव जंतुओं व वनस्पति प्रणालियों को बचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसमें जैव-विविधता को बचाने व उनके विकास हेतु 17 प्रतिशत भूमि तथा 10 प्रतिशत समुद्री क्षेत्र का संरक्षण करना निर्धारित किया गया। वर्तमान में 13 प्रतिशत भूमि तथा 1 प्रतिशत समुद्र ही संरक्षित है।
  • जैव-विविधता के ह्रास के कारण –
  • जैव विविधता का क्षरण एक प्राकृतिक प्रक्रिया है लेकिन वर्तमान में इसके संकट के लिए मानवीय कारक भी जिम्मेदार है जिनमें औद्योगीकरण, नगरीकरण, कृषि कार्य में प्रयोग किए जाने वाले रसायन, जनसंख्या वृद्धि इत्यादि।
  • 1. प्राकृतिक आवासों का विनाश
  • यह जैव-विविधता ह्रास का सबसे प्रमुख कारण है। तीव्र गति से वनों का विनाश करना, वनों में सड़कों, भवनों एवं औद्योगिक विकास के कारण वन्य जीवों के अलावा प्राकृतिक आवास भी नष्ट हो रहे हैं।
  • विश्व स्तर पर विभिन्न जीव-जंतुओं के प्राकृतिक आवास नष्ट होने के कारण जीव-जंतुओं की आबादी कम हो रही है जिससे उनके समुदाय में समुचित वंश वृद्धि नहीं हो पा रही है।
  • आवासों का बिखराव
  • बड़े राष्ट्रीय पार्को, अभयारण्यों इत्यादि में विद्युत स्टेशनों, सड़कों का निर्माण, पर्यटक स्थलों के निर्माण के कारण जीव-जंतुओं के आवास में बिखराव हुआ है। फलतः उनकी संख्या में भारी कमी देखी गई है।
  • 3. प्रदूषण (Pollution)
  • बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के कारण जैव-विविधता का ह्रास हुआ है। जानवरों को दर्द निवारक के रूप में दिए जाने वाली दवा डाइक्लोफेनेक के कारण गिद्धों की संख्या में लगातार कमी आ रही है।
  • यह दवा गिद्ध पचा नहीं पाते और उनकी किडनी खराब हो जाती है और अंततः उनकी मृत्यु हो जाती है।
  • औद्योगिक अपशिष्टों, कीटनाशकों, रसायनों की मात्रा समुद्रों में लगातार बढ़ने से समुद्री प्रदूषण बढ़ रहा है और प्रवालों की मृत्यु हो रही है।
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