मैदान

  • धरातल पर पाई जाने वाली समस्त स्थलाकृतियों में मैदान सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। अति मंद ढाल वाली लगभग सपाट या लहरिया निम्न भूमि को मैदान कहते हैं। भूपटल के द्वितीय श्रेणी के सभी उच्चावचों में मैदान सर्वाधिक स्पष्ट तथा सरल है।
  • मैदान धरातल के लगभग 55 प्रतिशत भाग पर फैले हुए हैं। विश्व के अधिकांश मैदान नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी से बने हैं। मैदानों की औसत ऊँचाई लगभग 200 मीटर होती है। नदियों के अलावा कुछ मैदानों का निर्माण वायु, ज्वालामुखी और हिमानी द्वारा भी होता है।
  • अति मंद ढाल वाली लगभग सपाट या लहरिया निम्न भूमि को मैदान कहते हैं।

मैदानों का वर्गीकरण –

(A) रचना के अनुसार वर्गीकरण

1. समतल मैदान (flat plain)

2. तरंगित मैदान (undulating plain)

3. लहरदार या उर्मिल मैदान (rolling plain)

4. विच्छेदित या विभाजित मैदान (dissected plain)

(B) निर्माण की प्रक्रिया के अनुसार

1. अन्तर्जात बल द्वारा उत्पन्न मैदान (रचनात्मक मैदान)

(i) पटल विरूपणी मैदान

(अ) उत्थान द्वारा निर्मित मैदान

(ब) अवतलन तथा निक्षेप द्वारा निर्मित मैदान

(ii) आकस्मिक घटनां द्वारा निर्मित मैदान

(ii) ज्वालामुखी (लावा) मैदान

2. बहिर्जात बल द्वारा निर्मित मैदान

(i) अपरदनात्मक मैदान

(ii) निक्षेपणात्मक मैदान

पटलविरूपणी मैदान (Diastrophic Plain) –

  • पटलविरूपणी क्रिया के अन्तर्गत महादेशजनक बल (epeirogenetic force) द्वारा भूपटल में उत्थान तथा अवतलन या सागर से स्थलखण्ड के निर्गमन (emergence) या निमज्जन (submergence) के कारण मैदानों का निर्माण होता है।
  • इस क्रिया द्वारा मुख्य रूप से अधिमहाद्वीपीय सागरों (epicontinental seas) में निमज्जित भाग के ऊपर उठने या अवतलित होने से उस पर निक्षेप के कारण मैदानों का निर्माण होता है।
  • अधिसागरीय भाग से उत्थान के कारण निर्मित मैदानों में संयुक्त राज्य अमेरिका के वृहत् मैदान (Great Plains Province) अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। –

अपरदनात्मक मैदान –

  • भूपटल पर समतल स्थापक शक्तियाँ (नदी, हिमानी, पवन, सागरीय लहरें) स्थलखण्ड की विषमताओं को अपरदन द्वारा दूर करने का प्रयास करती. हैं।
  • अन्ततः उत्थित विभिन्न उच्चावच वाला स्थलखण्ड एक सपाट तथा आकृतिविहीन मैदान के रूप में बदल जाता है। निम्न अपरदनात्मक मैदानों का उल्लेख किया जा रहा है-

(i) नदी द्वारा निर्मित अपरदनात्मक मैदान – 

नदियों के अपरदन द्वारा निर्मित मैदानों में सर्वप्रथम पेनीप्लेन या समप्राय मैदान है। नदियाँ अपने अपरदनचक्र की अन्तिम अवस्था में उच्च स्थल खण्ड (पहाड़, पठार आदि) को काटकर अपने आधार तल को प्राप्त कर लेती हैं। इस तरह से निर्मित मैदान को ‘पेनीप्लेन’ या ‘समप्राय’ मैदान कहा जाता है।

(ii) हिमअपरदित मैदान (glaciated plain) –

हिमानी अपने अपरदन द्वारा उच्च भाग को घिसकर सपाट, परन्तु उच्चावच युक्त मैदान का निर्माण करती है। हिमानीघर्षित मैदान में चोटियाँ गोलाकार होती हैं व घाटियाँ चौड़ी होती हैं। उदाहरणः उत्तरी अमेरिका के उत्तरी भाग तथा उत्तर- पश्चिमी यूरेशिया में मिलते हैं।

(iii) पवन अपरदित मैदान मरुस्थलीय भागों से चट्टानें –

यांत्रिक अपक्षय द्वारा विघटित तथा वियोजित होकर ढीली पड़ जाती हैं। वेगवती पवन इन ढीले कणों को उड़ाकर अन्यत्र जमा करती है। इस तरह की क्रिया की लम्बे समय तक पुनरावृत्ति के कारण चट्टानी भाग घिसकर मैदान के रूप में बदल जाता है। पवन द्वारा घर्षित मैदान के उदाहरण सहारा के रेग, सेरिर तथा हम्माद हैं।

(iv) चूनेदार मैदान या कार्स्ट मैदान

चूने की चट्टान वाले क्षेत्र में भूमिगत जल की क्रिया द्वारा उसकी ऊपरी सतह तथा निचली सतह में अपरदन कार्य होता रहता है, जिस कारण एक लम्बे समय में अधिकांश भाग कटकर तथा घिसकर नीचा हो जाता है। जीर्णावस्था में जब अधिकांश चूने की चट्टानें घिसकर कट जाती हैं तो अपवाह प्रतिरूप सतह पर दृष्टिगत होता है। इस समय तक पठार कटकर एक मैदान के रूप में बदल जाता है परन्तु इस तरह के मैदान की ऊपरी सतह बिल्कुल समतल नहीं होती है। धरातल ऊबड़-खाबड़ तथा तरंगित (undulating) होता है।

निक्षेपजनित मैदान निक्षेप द्वारा निर्मित मैदान बड़े भी होते हैं तथा छोटे भी गंगा-सतलुज का मैदान, मिसिसिपी का मैदान, यांग्टीसीक्यांग का मैदान, ह्वांग-हो (यलो नदी) का मैदान आदि नदियों द्वारा लाए गए मलबे के निरन्तर जमा होते रहने से ही निर्मित हुए हैं। उपर्युक्त मैदान निश्चित रूप से विस्तृत तथा सर्वाधिक उपजाऊ मैदानों के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

(1) नदी द्वारा निक्षेपित मैदान – 

अपरदन के कारकों द्वारा निक्षेप से बने हुए मैदानों में नदी द्वारा निक्षेपित मैदान सर्वाधिक विस्तृत तथा महत्त्वपूर्ण होता है। विश्व की प्रसिद्ध नदियों के मैदान इसके प्रमुख उदाहरण हैं। नदी द्वारा निर्मित मैदानों में गिरिपद जलोढ़ मैदान, बाढ़ के मैदान तथा डेल्टा मैदान अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।

(i) गिरिपद जलोढ़ मैदान नदी के निक्षेप द्वारा निर्मित मैदानों को मुख्य रूप से ‘जलोढ़ मैदान’ कहा जाता है। भारत में हिमालय पर्वत की निचली तलहटी में पर्वत के पाद के पास बड़े-बड़े टुकड़ों के ढेर से निर्मित इस तरह का मैदान भाबर कहा जाता है।

(ii) बाढ़ मैदान (flood plains) नदी जब अपरदन द्वारा अपने आधार तल को प्राप्त कर लेती है, तो उसकी धारा मन्द पड़ जाती है। फलस्वरूप वह अपने अगल-बगल बारीक कणों वाले पदार्थों का निक्षेपण करने लगती है। बाढ़ के समय तक जितनी दूरी तक नदी का जल फैल जाता है, वहाँ तक बारीक कणों से मलबे का निक्षेप हो जाने से निर्मित मैदान को बाढ़ का मैदान कहा जाता है।

(iii) डेल्टा का मैदान जब नदियाँ सागरों या झीलों में गिरती हैं तो वेग में कमी के कारण मुहाने के पास तलछट का निक्षेप होने से समतल तिकोनाकार मैदान का निर्माण होता है, जिसे ‘डेल्टा’ कहते हैं। यह ग्रीक भाषा के अक्षर से मिलता है। अतः इस मैदान को ‘डेल्टा’ कहते हैं। गंगा नदी का डेल्टा 50,000 वर्गमील के क्षेत्र में फैला हुआ है। डेल्टा के ऊँचे भागों को चार तथा निचले भागों को बील (बंगाल में) कहा जाता है। डेल्टाई मैदान भी खेती की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।

(2) झीलकृत मैदान –

झीलों में गिरने वाली नदियाँ अपने साथ लाए हुए मलबे का उनमें निक्षेप करती रहती हैं, जिनसे झीलों की तली उथली होती जाती है और गहराई कम हो जाती है। धीरे-धीरे तलछटीय निक्षेप द्वारा झील भर जाती है और एक सपाट मैदान का निर्माण हो जाता है। दूसरे रूप में पृथ्वी के अन्तर्जात बल के कारण पटलविरूपणी संचलन द्वारा झील की तली ऊपर उठ आती है, जिससे उसका जल बह जाता है और एक मैदान का निर्माण होता है।

(3) लावा मैदान –

ज्वालामुखी उद्गार से निकले लावा का जब पतली चादर के रूप में निचले भागों में निक्षेप हो जाने से सपाट भाग का निर्माण हो जाता है, तो उसे लावा मैदान कहते हैं। अधिक लावा के निक्षेप के कारण ऊँचें’ भाग ‘पठार’ कहे जाते हैं परन्तु उनका अपरदन हो जाने पर मैदान का निर्माण हो जाता है। लावा मैदान काली मिट्टी के कारण खेती के लिए अधिक उपजाऊ होता है।

(4) पवन द्वारा निक्षेपित मैदान- 

पवन द्वारा निक्षेपित मैदान दो तरह के होते हैं। एक तो रेतीला मैदान या रेगिस्तानी मैदान होता है तथा दूसरा लोयस का मैदान। मरुस्थलीय भागों में पवन, यांत्रिक अपक्षय द्वारा विघटित एवं वियोजित बालुका पत्थर से बालू या रेत को उड़ाकर अन्यत्र जमा करके मैदानों का निर्माण करती है। लोयस का मैदान प्रायः मरुस्थलों से दूर निर्मित होता है। मरुस्थलीय भागों से आने वाली आँधियाँ अपने साथ में रेत तथा अन्य मिट्टी के कणों को उड़ाकर अधिक दूर तक ले जाती हैं। जहाँ पर उनकी गति मन्द पड़ जाती है, वहीं पर इन पदार्थों का निक्षेपण हो जाने से ‘लोयस मैदान’ का निर्माण होता है। चीन के प्रसिद्ध लोयस के मैदान का निर्माण इसका एक प्रमुख उदाहरण है।

(5) कार्स्ट मैदान –

चूना पत्थर वाले चट्टानी क्षेत्रों में जल के प्रभावी अपरदन व घुलनशीलता से संपूर्ण भू-भाग एक समतल मैदान में परिवर्तित हो जाती है, जिससे कार्स्ट मैदान की उत्पत्ति हो जाती है। उदाहरण के लिए यूगोस्लाविया में एड्रियाटिक सागर के समीप कार्स्ट मैदान।

(6) हिमानी द्वारा निक्षेपित मैदान –

हिमानी तथा हिमचादर द्वारा मलबा के निक्षेप को ‘हिमानीकृत मैदान’ कहा जाता है। उत्तरी पश्चिमी यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में प्लीस्टोसीन हिमाच्छादन के कारण निर्मित हिमानी मैदान अत्यधिक विस्तृत क्षेत्रों में मिलते हैं। इनकी सतह समतल नहीं होती है, क्योंकि निक्षेप द्वारा तरह-तरह के छोटे-छोटे मरुस्थलों की रचना हो जाती है।

(i) टिल मैदान – हिमानी द्वारा लाए गए छोटे कणों से लेकर बड़े कणों वाले टुकड़ों को. ‘टिल’ कहा जाता है। इनके निक्षेपण से निर्मित मैदान टिल मैदान होता है, जिसका तल लहरदार होता है और इसमें छोटी-छोटी चोटियाँ तथा गड्ढे होते हैं।

(ii) हिमोढ़ मैदान (moraine plains) – हिमानी द्वारा बारीक कों वाले मलबे को ‘हिमोढ़’ कहते हैं। हिमोढ़ द्वारा निर्मित मैदान मुख्य रूप से असमान धरातल वाले होते हैं।

(iii) हिमनद अवक्षेप मैदान हिमचादर के पिघल जाने पर जलधारा के द्वारा रेत, बजरी, मृत्तिका आदि का निक्षेप हो जाने से समतल सतह वाले मैदान को ‘हिमनद अवक्षेप मैदान कहते हैं।

धरातलीय बनावट की दृष्टि से मैदान को निम्न चार वर्गों में विभाजित किया है-

(i) समतल मैदान – उच्चावचीय कम विषमता वाले सपाट तथा विस्तृत मैदान को ‘समतल मैदान’ कहा जाता है। इस तरह के मैदान में निम्नतम तथा उच्चतम भागों का अन्तर 15 मीटर से अधिक नहीं होता है।

(ii) तरंगित मैदान (undulating plains) समान उतार व चढ़ाव वाले मैदान को ‘तरंगित मैदान’ कहा जाता है, जिसमें निम्नतम तथा उच्चतम भागों में अन्तर 15 मीटर से 50 मीटर तक होता है।

(iii) लहरदार या बेलनी मैदान (rolling plains) – जब मैदान की सतह समतल न होकर विषम होती है तथा छोटे-बड़े टीले यत्र-तत्र मिलते हैं, तो उस मैदान को ‘लहरदार या बेलनी मैदान’ कहते हैं। इस तरह के मैदान में निम्नतम तथा उच्चतम भागों का अन्तर 50 से 100 मीटर तक होता है।

(iv) विच्छेदित मैदान (dissected plains) –

अनाच्छादन (denudation) द्वारा कटे-फटे तथा ऊबड़-खाबड़ मैदान को ‘विच्छेदित मैदान’ कहते हैं, जिनमें उच्चतम तथा निम्नतम भागों में 75 से 100 मीटर तक का अन्तर होता है।

  • महाद्वीपीय निमग्न तट के उत्थान अथवा भूमि के नीचे थैंसने के कारण बने मैदान संरचनात्मक मैदान कहलाते हैं।
  • पर्वत और पठारों के लम्बे समय तक अपरदन से बने मैदान अपरदन जनित मैदान या समप्राय भूमि कहलाती है।
  • नदी, हिमानी, पवन, आदि तल संतुलन के कारकों द्वारा ढोए पदार्थों के जमाव से बने मैदानों को निक्षेपण द्वारा बने मैदान कहते हैं।
  • निक्षेपण द्वारा बने मैदानों के प्रकार हैं-जलोढ़ मैदान, सरोवरी मैदान, हिमानी कृत मैदान और लोयस मैदान।

मैदानों का आर्थिक महत्त्व –

1.मैदानों ने मानव जीवन को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित किया है:-

1 . उपजाऊ मृदा

  • मैदानों की मृदा सबसे अधिक उपजाऊ तथा गहरी होती है।
  • समतल होने के कारण सिंचाई के साधनों का पर्याप्त विकास हुआ है। इन दोनों के कारण मैदानों में कृषि सर्वाधिक विकसित है। इसलिए मैदानों को ‘संसार का अन्न भंडार’ कहा जाता है।

2. उद्योगों का विकास

  • समतल, उपजाऊ एवं सिंचाई की सुविधाओं के कारण मैदानों में कृषि प्रधान उद्योगों का विकास हुआ है। जिससे लोगों को रोजगार मिलता है तथा राष्ट्रीय उत्पादन तथा प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है।
  • अधिक जनसंख्या के कारण कृषि तथा उद्योगों के लिए सस्ते श्रमिक मिल जाते हैं।

3. यातायात की सुविधा

मैदानों का तल समतल होने के कारण यहाँ आवागमन के साधनों -रेलमार्गों, सड़कों, हवाई अड्डों आदि को बनाना सुविधाजनक होता है।

 4 . सभ्यताओं के केन्द्र

  • मैदान प्राचीन एवं आधुनिक सभ्यताओं के केन्द्र हैं।
  • विश्व की प्रमुख नदी घाटी सभ्यताओं का उद्भव मैदानों में ही हुआ है।
  • सिंधु घाटी की सभ्यता और नील घाटी की सभ्यता इसके उदाहरण हैं।

5 . नगरों की सभ्यता

  • रेल, सड़क तथा नदियों द्वारा यातायात की सुविधाओं तथा कृषि और उद्योगों के विकास ने नगरों की स्थापना और विकास को प्रोत्साहित किया।
  • मैदानों में विश्व के सबसे विकसित व्यापारिक नगर और पत्तन स्थित हैं। रोम, टोक्यो, कोलकाता, यंगून (रंगून), कानपुर तथा पेरिस आदि नगर मैदानों में ही स्थित हैं।

मैदानों का आर्थिक महत्त्व हैः समतल और उपजाऊ मृदा की प्राप्ति, उद्योगों के विकास की सुविधा, आवागमन के साधनों के विस्तार की सुविधा, प्राचीन एवं आधुनिक सभ्यताओं के केन्द्र और व्यापारिक नगरों और बन्दरगाहों की स्थापना ।

मैदान: एक रंगीन भौगोलिक अवलोकन

मैदान: एक महत्त्वपूर्ण स्थलाकृति

धरातल पर पाई जाने वाली समस्त स्थलाकृतियों में मैदान सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। अति मंद ढाल वाली लगभग सपाट या लहरिया निम्न भूमि को मैदान कहते हैं। भूपटल के द्वितीय श्रेणी के सभी उच्चावचों में मैदान सर्वाधिक स्पष्ट तथा सरल है।

मैदान धरातल के लगभग 55 प्रतिशत भाग पर फैले हुए हैं। विश्व के अधिकांश मैदान नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी से बने हैं। मैदानों की औसत ऊँचाई लगभग 200 मीटर होती है। नदियों के अलावा कुछ मैदानों का निर्माण वायु, ज्वालामुखी और हिमानी द्वारा भी होता है।

मैदानों का व्यापक वर्गीकरण

(A) रचना के अनुसार वर्गीकरण

  • समतल मैदान (flat plain)
  • तरंगित मैदान (undulating plain)
  • लहरदार या उर्मिल मैदान (rolling plain)
  • विच्छेदित या विभाजित मैदान (dissected plain)

(B) निर्माण की प्रक्रिया के अनुसार

1. अन्तर्जात बल द्वारा उत्पन्न मैदान (रचनात्मक मैदान)

  • पटल विरूपणी मैदान
    • उत्थान द्वारा निर्मित मैदान
    • अवतलन तथा निक्षेप द्वारा निर्मित मैदान
  • ज्वालामुखी (लावा) मैदान

पटलविरूपणी मैदान (Diastrophic Plain): महादेशजनक बल द्वारा भूपटल में उत्थान तथा अवतलन के कारण इनका निर्माण होता है।

बहिर्जात बल द्वारा निर्मित अपरदनात्मक मैदान

भूपटल पर समतल स्थापक शक्तियाँ (नदी, हिमानी, पवन, सागरीय लहरें) अपरदन द्वारा स्थलखण्ड की विषमताओं को दूर करके अंततः एक सपाट मैदान बनाती हैं।

  • (i) नदी द्वारा निर्मित (पेनीप्लेन/समप्राय मैदान): नदियाँ अपने अपरदनचक्र की अन्तिम अवस्था में उच्च स्थल खण्ड को काटकर अपने आधार तल को प्राप्त कर लेती हैं।
  • (ii) हिमअपरदित मैदान: हिमानी द्वारा उच्च भाग को घिसकर निर्मित। (उदाहरणः उत्तरी अमेरिका)
  • (iii) पवन अपरदित मैदान: वेगवती पवन द्वारा चट्टानी भाग को घिसकर निर्मित। (उदाहरणः सहारा के रेग)
  • (iv) चूनेदार मैदान या कार्स्ट मैदान: चूने की चट्टान वाले क्षेत्र में भूमिगत जल की क्रिया द्वारा निर्मित।

निक्षेपणात्मक मैदान (जमाव द्वारा निर्मित)

ये मैदान नदियों द्वारा लाए गए मलबे के निरन्तर जमा होते रहने से निर्मित हुए हैं, जो अत्यधिक उपजाऊ होते हैं।

(1) नदी द्वारा निक्षेपित मैदान:

  • गिरिपद जलोढ़ मैदान: हिमालय पर्वत की निचली तलहटी में (जैसे: भाबर)।
  • बाढ़ मैदान: नदी द्वारा अगल-बगल बारीक कणों का निक्षेपण करने से निर्मित।
  • डेल्टा का मैदान: नदियों के मुहाने पर तलछट के निक्षेप से निर्मित तिकोनाकार मैदान। (उदाहरण: गंगा नदी का डेल्टा)

(2) झीलकृत, लावा, और पवन निक्षेपित मैदान:

  • झीलकृत मैदान: झीलों के तलछटीय निक्षेप द्वारा भर जाने से निर्मित।
  • लावा मैदान: ज्वालामुखी उद्गार से निकले लावा के पतली चादर के रूप में जमाव से।
  • लोयस का मैदान: मरुस्थलीय भागों से पवन द्वारा उड़ाकर लाई गई मिट्टी के कणों के निक्षेपण से। (चीन इसका प्रमुख उदाहरण है)

धरातलीय बनावट के आधार पर वर्गीकरण

धरातलीय बनावट की दृष्टि से मैदान को चार मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है:

  1. समतल मैदान: उच्चावचीय कम विषमता वाले सपाट मैदान। (15 मीटर से कम अंतर)
  2. तरंगित मैदान: समान उतार व चढ़ाव वाले मैदान। (15 मी. से 50 मी. तक अंतर)
  3. लहरदार या बेलनी मैदान: सतह विषम होती है तथा छोटे-बड़े टीले मिलते हैं। (50 मी. से 100 मी. तक अंतर)
  4. विच्छेदित मैदान: कटा-फटा तथा ऊबड़-खाबड़ मैदान। (75 मी. से 100 मी. तक अंतर)

सारांश: संरचनात्मक मैदान, अपरदन जनित मैदान और निक्षेपण द्वारा बने मैदान मुख्य प्रकार हैं।

✨ मैदानों का अपार आर्थिक महत्त्व

मैदान मानव जीवन और सभ्यता के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण रहे हैं:

  1. **उपजाऊ मृदा:** मैदानों को 'संसार का अन्न भंडार' कहा जाता है क्योंकि इनकी मृदा सबसे अधिक उपजाऊ होती है।
  2. **उद्योगों का विकास:** कृषि तथा उद्योगों के लिए सस्ते श्रमिक और अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध होती हैं।
  3. **यातायात की सुविधा:** समतल तल के कारण रेलमार्गों, सड़कों और हवाई अड्डों का विकास आसान होता है।
  4. **सभ्यताओं के केन्द्र:** विश्व की प्रमुख नदी घाटी सभ्यताओं का उद्भव यहीं हुआ है। (सिंधु घाटी की सभ्यता)
  5. **नगरों की स्थापना:** व्यापारिक नगरों और बन्दरगाहों की स्थापना मैदानों में ही हुई है। (रोम, टोक्यो, कोलकाता)।
Scroll to Top