गुर्जर-प्रतिहार वंश: इतिहास, शासक, राजधानी एवं महत्वपूर्ण तथ्य

Gurjara Pratihara Dynasty History Rulers Capital

Gurjara-Pratihara Dynasty infographic showing major rulers including Nagabhata, Vatsaraja, Mihir Bhoja, and Mandore Pratiharas history.

गुर्जर-प्रतिहार वंश: इतिहास, शासक, राजधानी एवं महत्वपूर्ण तथ्य

गुर्जर-प्रतिहार वंश

गुर्जर जाति का सर्वप्रथम उल्लेख ‘एहोल अभिलेख’ में किया गया है।

गुर्जर-प्रतिहार वंश की स्थापना छठी शताब्दी के द्वितीय चरण में उत्तर-पश्चिम भारत में हुई थी।

नीलकुंड, राधनपुर, देवली तथा करडाह शिलालेख में प्रतिहारों को गुर्जर कहा गया है।

अरब यात्रियों ने इन्हें ‘जुर्ज’ कहा है। अलमसूदी ने गुर्जर-प्रतिहार को ‘अल गुर्जर’ और राजा को ‘बोरा’ कहा है।

स्मिथ, ब्यूलर, हर्नले आदि विद्वानों ने प्रतिहारों को हूणों की संतान बताया है।

मुहणोत नैणसी ने गुर्जर प्रतिहारों की 26 शाखाओं’ का वर्णन किया, जिनमें मंडोर, जालोर, राजोगढ़, कन्नौज, उज्जैन और भड़ौच प्रमुख हैं।

गुर्जर-प्रतिहार वंश का संस्थापक – ‘हरिश्चन्द्र’ (रोहलिद्धि)

समय – छठी शताब्दी ईस्वी

राजधानी – मंडोर

गुर्जर-प्रतिहारों को ‘भारत का द्वारपाल’ कहा जाता है।


(i) मण्डोर के प्रतिहार

घटियाला शिलालेख में मण्डोर के प्रतिहार वंश की प्रारम्भिक स्थिति व वंशावली मिलती है।

घटियाला शिलालेख के अनुसार हरिश्चन्द्र नामक ब्राह्मण की क्षत्रिय पत्नी भद्रा से चार पुत्र भोगभट्ट, कद्दक, रज्जिल और दह उत्पन्न हुए। हरिश्चन्द्र के चारों पुत्रों ने माण्डव्यपुर (मण्डोर) को जीता तथा इसके चारों ओर परकोटा बनवाया।

मण्डोर के प्रतिहार वंश की वंशावली हरिश्चन्द्र के तीसरे पुत्र रज्जिल से शुरू होती है।

रज्जिल

  • रज्जिल ने मंडोर के आसपास के क्षेत्रों को जीतकर अपने राज्य का विस्तार किया।

नरभट्ट

  • यह रज्जिल का पुत्र व उत्तराधिकारी था।
  • उपाधि – ‘पिल्लापल्ली’

नागभट्ट-प्रथम

  • यह नरभट्ट का पुत्र था।
  • उपाधि – नाहड़
  • घटियाला शिलालेख के अनुसार इसने मण्डोर राज्य की पूर्वी सीमा का विस्तार कर अपनी राजधानी ‘मेड़ान्तक (मेड़ता)’ बनाई।

यशोवर्धन

  • यह नागभट्ट-प्रथम के पुत्र तात का पुत्र था।
  • राजोली ताम्रपत्र के अनुसार इसके समय पृथुवर्धन ने गुर्जर प्रतिहार राज्य पर असफल आक्रमण किया था।

शिलुक

  • यह गुर्जर प्रतिहार के राजा यशोवर्धन के पुत्र चन्दुक का पुत्र था।
  • घटियाला शिलालेख के अनुसार शिलुक ने देवराज भाटी से युद्ध किया तथा उसे मारकर उसके राज्य चिह्न व छत्र छीन लिया था।

कक्क

  • कक्क ने मुदागिरी (मुंगेर, बिहार) में गौड़ राजा धर्मपाल को पराजित किया था।
  • कक्क की पत्नी पद्मिनी से उत्पन्न पुत्र बाउक था तथा कक्क की दूसरी पत्नी दुर्लभदेवी से उत्पन पुत्र कक्कुक था।

बाउक

  • कक्क का उत्तराधिकारी बाउक था।
  • बाउक ने राजा मयूर के आक्रमण को विफल किया तथा इस विजय के उपलक्ष्य में मण्डोर शिलालेख उत्कीर्ण करवाया था।

कक्कुक

  • इनके समय घटियाला के दो शिलालेख उत्कीर्ण किए गए थे।
  • घटियाला के शिलालेखों में कक्कुक को मरु, वल्ल, गुर्जरात्रा, मांड (जैसलमेर), अज्ज (मध्य प्रदेश) व तृवणी आदि राज्यों में ख्याति फैलाने वाला राजा कहा गया है।
  • इन्होंने वट्टनानक (नाणा-बेड़ा) नामक नगर बसाया।
  • इन्होंने आभीरों का आक्रमण विफल कर इसकी विजय के उपलक्ष्य में रोहिंसकूप व मण्डोर में विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया था।
  • मण्डोर की ईन्दा प्रतिहार शाखा ने चूण्डा राठौड़ को 1395 ई. में मण्डोर को दहेज में दे दिया।

(ii) जालोर, कन्नौज व उज्जैन के गुर्जर प्रतिहार

नागभट्ट-प्रथम से जालोर (भीनमाल) के प्रतिहार वंश का आरम्भ होता है।

यहाँ के गुर्जर प्रतिहार रघुवंशी प्रतिहार कहलाते हैं।

इस शाखा का उद्भव मण्डोर की शाखा से हुआ।

चीनी यात्री ‘ह्वेनसांग’ ने कुल 72 देशों की यात्रा की थी। उसने भीनमाल को ‘पि-लो-मो-लो/भीलामाला’ तथा गुर्जर राज्य को ‘कु-चे-लो’ कहा।

नागभट्ट प्रथम

  • मण्डोर के प्रतिहार इनके सामन्तों के रूप में शासन करते थे।
  • इनका राज्य उत्तर में मारवाड़ से दक्षिण में भड़ौच तक फैला था, जिसमें लाट, जालोर, आबू व मालवा के कुछ भाग शामिल थे।
  • इनका दरबार ‘नागावलोक का दरबार’ कहलाता था।
  • जालोर, अवन्ति, कन्नौज प्रतिहारों की नामावली नागभट्ट से ही प्रारंभ होती है।
  • नागभट्ट-प्रथम गुर्जर प्रतिहारों का प्रथम शक्तिशाली शासक था, जिसने अरबों तथा बलुचों के आक्रमण को रोके रखा।

उपाधियाँ –

  1. नारायण का अवतार (अरबों पर विजय प्राप्त करने के कारण)
  2. मेघनाद के युद्ध का अवरोधक
  3. इन्द्र के दंभ का नाशक
  4. म्लेच्छों का नाशक (ग्वालियर प्रशस्ति)
  5. नारायण (ग्वालियर प्रशस्ति)

वत्सराज

  • उपाधि – रणहस्तिन
  • गुर्जर-प्रतिहार वंश का वास्तविक संस्थापक
  • वत्सराज के शासनकाल में 778 ई. में ‘उद्योतन सूरी’ ने जालोर में ‘कुवलयमाला’ नामक ग्रंथ प्राकृत भाषा में और 783 ई. ‘आचार्य जिनसेन सूरी’ ने ‘हरिवंश पुराण’ ग्रन्थ की रचना की।
  • ओसियां के जैन मंदिर प्रतिहार शासक वत्सराज के समय निर्मित हैं।
  • त्रिकोणात्मक संघर्ष की शुरुआत गुर्जर प्रतिहार नरेश वत्सराज ने की थी। यह संघर्ष 150 वर्षों तक (लगभग) चला। इसको प्रारंभ गुर्जर प्रतिहारों ने किया तथा अंतिम विजय भी इनकी ही हुई थी।
  • वत्सराज ने इन्द्रायुध को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार किया और इन्द्रायुध को अपना सामन्त बनाया।
  • वत्सराज ने पाल वंश के शासक धर्मपाल को पराजित किया था।
  • राष्ट्रकूट शासक ध्रुव-प्रथम ने वत्सराज को पराजित कर उज्जैन व कन्नौज पर अधिकार कर लिया और वत्सराज वहाँ से मरुस्थल में चले गए। इस युद्ध की जानकारी ‘राधनपुर’ और ‘वनी-डिंडोरी’ अभिलखों से मिलती है।

नागभट्ट द्वितीय

  • उपाधि – ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ (बुचकला अभिलेख)
  • इन्होंने उज्जैन और कन्नौज को जीत लिया और कन्नौज को अपनी राजधानी बनाई।
  • नागभट्ट द्वितीय के कन्नौज विजय का वर्णन ‘ग्वालियर अभिलेख’ में मिलता है।
  • ग्वालियर प्रशस्ति में इनको आन्ध्र, आनर्त, मालव, किरात, तुरूष्क, वत्स, मत्स्य आदि प्रदेशों का विजेता बताया गया है।
  • मान्यखेत के राष्ट्रकूट शासक गोविन्द तृतीय ने नागभट्ट द्वितीय को हराकर कन्नौज पर अधिकार कर लिया।
  • इनका दरबार भी ‘नागावलोक का दरबार’ कहलाता था।
  • मुसलमानों के विरुद्ध नागभट्ट द्वितीय के संघर्ष का प्रमाण ‘खुम्माण रासो’ नामक ग्रन्थ से मिलता है।

मिहिरभोज

  • भोज के नाम से विख्यात
  • इनका प्रथम अभिलेख ‘वराह अभिलेख’ है, जिसकी तिथि 893 विक्रम संवत् (836 ई.) है।
  • मिहिरभोज को बंगाल के शासक धर्मपाल के पुत्र देवपाल ने पराजित किया।
  • मिहिरभोज ने क्रमशः नारायणपाल व विग्रहपाल को हराया था।
  • 851 ई. में अरब यात्री ‘सुलेमान’ ने भारत की यात्रा की थी।
  • सुलेमान ने बताया कि मिहिरभोज मुसलमानों का सबसे बड़ा शत्रु था।
  • मिहिरभोज का साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बुंदेलखण्ड तक और पूर्व में उत्तरप्रदेश से लेकर पश्चिम में गुजरात और काठियावाड़ तक विस्तृत था।
  • कश्मीरी कवि ‘कल्हण’ ने अपने ग्रन्थ ‘राजतरंगिणी’ में मिहिरभोज के साम्राज्य का उल्लेख किया।

उपाधियाँ –

  1. आदिवराह (ग्वालियर अभिलेख)
  2. प्रभास (दौलतपुर अभिलेख)
  • इनके समय में चाँदी और ताँबे के सिक्कों पर ‘श्रीमदादिवराह’ अंकित रहता था।
  • स्कन्ध पुराण के अनुसार मिहिरभोज ने तीर्थ यात्रा करने के लिए अपने पुत्र महेन्द्रपाल को सिंहासन सौंपकर राजपाठ त्याग दिया था।

महेंद्रपाल-प्रथम

शासनकाल – 893-909 ई.

उपाधियाँ (विद्धशालभंजिका ग्रन्थ में) –

  1. निर्भयराज
  2. निर्भय नरेंद्र
  3. रघुकुल तिलक
  4. रघुकुल चूड़ामणि
  5. हिंदू भारत का अंतिम महान हिंदू सम्राट (बी. एन. पाठक)
  • दरबारी राजकवि – ‘राजशेखर’
  • महेन्द्रपाल का शासन काठियावाड़ तक विस्तृत था।

महिपाल प्रथम

राजशेखर द्वारा प्रदत्त उपाधियाँ –

  1. आर्यावर्त का महाराजाधिराज
  2. रघुकुल मुक्तामणि
  3. रघुवंश-मुकुटमणि
  • ‘प्रचंड पाण्डव’ में महिपाल की विजयों का वर्णन मिलता है।
  • इनके समय 915 ई. में अरब यात्री ‘अल मसूदी’ ने भारत की यात्रा की थी।
  • अरब यात्री ‘अल मसूदी’ के अनुसार इन्होंने उत्तर-पश्चिम में पंजाब के ‘कुलूतों’ और ‘रनठों’ को पराजित किया था।
  • इनके समय राष्ट्रकूट शासक इन्द्र-तृतीय ने उज्जैन को अपने अधिकार में ले लिया था।
  • महिपाल-प्रथम ने चन्देल शासक हर्ष की सहायता से पुनः उज्जैन पर अधिकार कर लिया था।

महिपाल द्वितीय

  • महिपाल-द्वितीय का उल्लेख बयाना अभिलेख में मिलता है।
  • उपाधि – महाराजाधिराज महिपाल देव (बयाना अभिलेख)

राज्यपाल

  • 1018 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया, तब राज्यपाल भागकर जंगलों में चला गया था।
  • इस कारण बुंदेलखंड के शासक ‘विद्याधर चंदेल’ ने राज्यपाल को कायर कहना प्रारंभ कर दिया था।
  • विद्याधर चंदेल ने राज्यपाल पर आक्रमण किया। इस दौरान राज्यपाल वीरगति को प्राप्त हुआ।

त्रिलोचनपाल

शासनकाल – 1019-1027 ई.

राजधानी – ‘बारी’ (अलबरुनी के अनुसार)

  • इनके समय 1020 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया और लूट-मार करके वापस गजनी चला गया।

यशपाल

शासनकाल – 1027-1036 ई.

  • कड़ा शिलालेख में यशपाल व उनके दान का वर्णन मिलता है।
  • यह गुर्जर-प्रतिहारों का अंतिम शासक था।
  • इनके बाद गुर्जर-प्रतिहारों ने सामंतों के रूप में कुछ समय तक कन्नौज पर शासन किया।

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