बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम-2006

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम-2006

लागू - 1 नवम्बर, 2007
कुल धाराएँ - 21
भारत में विवाह के लिए पुरुष एवं महिला की आयु क्रमशः 21 वर्ष तथा 18 वर्ष निर्धारित की गई है।
राज्य में वर्तमान में अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल तृतीया) को सबसे अधिक बाल-विवाह होते हैं।
वर्ष 1885 में राजस्थान में सबसे पहले वॉल्टरकृत 'राजपूत हितकारिणी सभा' के निर्णयानुसार जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह ने बाल विवाह प्रतिबंधक कानून बनाया।
UNICEF की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में सर्वाधिक बाल विवाह भारत में होते हैं।
सर्वाधिक बाल विवाह राजस्थान, पश्चिम बंगाल व बिहार में होते हैं।
सबसे कम बाल विवाह हिमाचल प्रदेश में होते हैं।

शारदा एक्ट :-

28 सितम्बर, 1929 में राय बहादुर हरविलास शारदा (अजमेर) ने इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ऑफ इंडिया में पेश कर पारित करवाया।
इस अधिनियम के अंतर्गत लड़के की आयु 18 वर्ष तथा लड़की की आयु 14 वर्ष रखी गई।
शारदा एक्ट सम्पूर्ण भारत में लॉर्ड इरविन ने 1 अप्रैल, 1930 को लागू किया था।
शारदा एक्ट में मोरारजी देसाई सरकार के समय (1978) में विवाह की उम्र लड़के के लिए 21 वर्ष एवं लड़की की उम्र 18 वर्ष रखी गई।
शारदा एक्ट वर्ष 2006 तक प्रभावी रहा।

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम :-

राजस्थान में 11 सितम्बर, 2009 व उसके बाद विवाह करने वालों के लिए विवाहों का अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण विधेयक, 2009 के तहत पंजीयन की अनिवार्यता कर दी।
धारा-1:-
संक्षिप्त नाम, प्रारंभ व विस्तार।
नाम - बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 है, इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर लागू है।
धारा-2:-
परिभाषा
इस धारा में बालक की परिभाषा है, जिसके अंतर्गत जिस पुरुष की आयु 21 वर्ष या महिला की आयु 18 वर्ष से कम हो, बालक की श्रेणी में आएगा।
धारा-3:-
विवाह के बंधन में आने वाले किसी बाल पक्षकार के विकल्प पर बाल विवाहों का शून्यीकरण होना।

इसके संबंध में जिला न्यायालय में याचिका बालक के वयस्कता प्राप्त करने के 2 वर्ष (पुरुष 23 वर्ष / महिला 20 वर्ष) के भीतर दायर की जा सकेगी।
बालक अगर अवयस्क है तो याचिका उसके संरक्षक द्वारा दायर की जा सकती है।
धारा-4:-
बाल विवाह के बंधन में आने वाली महिला पक्षकार के भरण-पोषण एवं निवास के लिए उपबंध।

इसके तहत महिला का भरण-पोषण भत्ता वयस्क पुरुष देगा लेकिन पुरुष अवयस्क है तो उस पुरुष के संरक्षक द्वारा दिया जाएगा जब तक उस महिला का पुनर्विवाह नहीं हो जाता।
धारा-5:-
बाल विवाह बालकों की अभिरक्षा एवं भरण-पोषण।

इस धारा के अंतर्गत बाल विवाह से जन्में बालकों की अभिरक्षा के लिए जिला न्यायालय द्वारा समुचित आदेश दिया जाएगा लेकिन इसके लिए बालक के हित को ध्यान में रखते हुए बालक के कल्याण व सर्वांगीण विकास के लिए जिला न्यायालय बाल विवाह से उत्पन्न हुए बालक की सुरक्षा व पालन-पोषण का आदेश करेगा कि बालक को कहाँ भेजा जाए?
धारा-6:-
बाल विवाहों से जन्में बालकों की धर्मजत्व ।
धारा-7:-
धारा-4 व 5 के तहत जारी आदेशों को उपांतरित करने की जिला न्यायालय की शक्ति।
धारा-8:-
न्यायालय जिसे याचिका की जानी चाहिए।
धारा-9:-
बालक से विवाह करने वाले पुरुष वयस्क के लिए सजा का प्रावधान।

कोई 18 वर्ष से अधिक आयु का पुरुष वयस्क होते हुए बाल विवाह करेगा तो उसे 2 वर्ष का कारावास तथा 1 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा।
नोटः- उच्चतम न्यायालय में मोहन शांतानगौदर की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 की धारा-9 की पुनर्व्याख्या अक्टूबर, 2017 में की जिसके अंतर्गत अगर 18 से 21 वर्ष की आयु के पुरुष को वयस्क महिला के साथ विवाह करने के लिए दण्डित नहीं किया जाएगा।
धारा-10:-
बाल विवाह पर भोज करने पर दण्ड का प्रावधान।

सजा - 2 वर्ष तक।
जुर्माना- 1 लाख रुपये तक।
धारा-11:-
बाल विवाहों के अनुष्ठान को अतिप्रेरित या अनुज्ञात करने के लिए दण्ड का प्रावधान।

सजा - 2 वर्ष तक।
जुर्माना - 1 लाख रुपये तक (नोट इसमें स्त्री के लिए कारावास नहीं होगा)
धारा-12:-
कुछ परिस्थितियों में अवयस्क बालक के विवाह का शून्य होना।
धारा-13:-
बाल विवाहों को प्रतिषेध करने वाला व्यादेश जारी करने की न्यायालय की शक्ति।

इसके अंतर्गत ग्राम पंचायत स्तर पर अगर बाल विवाह का अंदेशा हो तो सरपंच, पंचायत का सदस्य व अधिकारीगण ऐसे होने वाले बाल विवाह की सूचना संबंधित अधिकारी या बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी, उप-खण्ड अधिकारी को देने को बाध्य होंगे। ऐसा नहीं करने पर उनके खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 187 के तहत कार्यवाही की जा सकती है।
धारा-14:-
व्यादेशों के उल्लंघन में बाल विवाहों का शून्य होना।

धारा-13 के तहत जारी आदेशों के उल्लंघन में, चाहे वह अंतरिम हो या अंतिम, अनुष्ठापित किया गया कोई बाल-विवाह प्रारंभ से ही शून्य होगा।
धारा-15:-
अपराधों का संज्ञेय और गैर-जमानतीय होना।
धारा-16:-
बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी का प्रावधान।
धारा-17:-
बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी का लोक सेवक होना।

भारतीय दण्ड संहिता (1860) क (45) की धारा 21 के अंतर्गत लोक सेवक समझे जाएँगे।
धारा-18:-
सद्भावपूर्वक की गई कार्यवाही का संरक्षण।
धारा-19:-
राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति।
धारा-20:-
हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अधिनियम संख्या 25 का संशोधन।
धारा-21:-
निरसन एवं व्यावृत्तियाँ।

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 1929 (1929 का 19) इसके द्वारा निरसित किया जाता है।
नोटः- बाल विवाह मुक्त राजस्थान साझा अभियान की शुरुआत 18 जुलाई, 2016 को महिला अधिकारिता निदेशालय तथा महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से यूनीसेफ व UNFPA के सहयोग से जयपुर में की गई।

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