बालक एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम-1986
मूल जानकारी
- लागू – गुरुपद स्वामी समिति की सिफारिश पर।
- राजपत्र में प्रकाशन – 23 दिसम्बर, 1986
- कुल अध्याय – 4
- कुल धाराएँ – 22
मुख्य प्रावधान
- 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को घरेलू इकाइयों को छोड़कर अन्य सभी प्रकार के प्रतिष्ठानों में नियोजन से निषिद्ध किया गया।
- उल्लंघन करने पर – 3 माह से 1 वर्ष तक का कारावास तथा 10 से 20 हजार रुपये तक जुर्माना या दोनों।
- बालक – जिसकी अधिकतम आयु 18 वर्ष से कम हो, बालक माना जाएगा।
महत्वपूर्ण नोट
- बालक एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियम) अधिनियम, 1986 की धारा-3 के अंतर्गत 14 वर्ष के बालक से किसी भी प्रकार के जोखिम वाले क्षेत्र या बिना जोखिम वाले क्षेत्र में काम करवाना संज्ञेय अपराध (ऐसा अपराध जिसमें पुलिस किसी व्यक्ति को बिना वारण्ट के गिरफ्तार कर सकती है) की श्रेणी में आता है।
- बाल और किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम 1986 (जैसा कि 2016 में शामिल किया गया) की धारा-14A के अनुसार, नियोक्ता द्वारा किया गया और धारा-3 या धारा-3A के तहत दण्डनीय कोई भी अपराध संज्ञेय होगा।
- बालक व किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 की धारा 2(ix) के अनुसार सप्ताह का अर्थ है शनिवार की रात या ऐसी अन्य रात जिसे किसी विशेष क्षेत्र के लिए अनुमोदित किया गया हो, की मध्यरात्रि से शुरू होने वाले 7 दिनों की अवधि है।
अध्याय-1 : प्रारंभिक
धारा-1:
- नाम – बालक एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन), 1986
- संक्षिप्त नाम, विस्तार व प्रारंभ।
धारा-2:
- विस्तार – सम्पूर्ण भारत।
- परिभाषाएँ
- स्थापन – कोई भी दुकान, वाणिज्यिक स्थापन, कर्मशाला, फार्म, आवासीय होटल, भोजन गृह, नाट्य गृह या सार्वजनिक मनोरंजन का स्थान, स्थापन के अंतर्गत आते हैं।
अध्याय-2 : कुछ उपजीविकाओं और प्रक्रियाओं में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध
धारा-3:
- 14 वर्ष से कम उम्र के बालक को कुछ उपजीविकाओं एवं प्रक्रियाओं में नियोजन का प्रतिषेध।
धारा-4:
- अनुसूची का संशोधन करने की शक्ति।
- केन्द्र सरकार अनुसूची में किसी उपजीविका या प्रक्रिया को जोड़ने के लिए कम से कम तीन मास की सूचना द्वारा राजपत्र में अधिसूचना जारी कर संशोधन कर सकती है।
धारा-5:
- बालक श्रम तकनीकी सलाहकार समिति।
- इस समिति में 1 अध्यक्ष और 10 सदस्य होंगे।
अध्याय-3 : बालकों के काम की परिस्थितियों का विनियमन
धारा-6:
- अध्याय का लागू होना।
- इस अध्याय के उपबंध ऐसे स्थापन या स्थापनों के वर्ग को लागू होंगे, जिसमें धारा-3 में निर्दिष्ट उपजीविकाओं या प्रक्रियाओं से कोई नहीं की जाती है।
धारा-7:
- काम के घंटे एवं समयावधि।
- किसी बालक को 6 घंटे से अधिक काम करने में नहीं लगाया जाएगा।
- लगातार 3 घंटे से अधिक की समयावधि नहीं होगी तथा प्रत्येक तीन घंटे बाद 1 घंटे का विश्राम काल होगा।
- किसी बालक को शाम 7 बजे से प्रातः 8 बजे के मध्य काम नहीं करवाया जाएगा तथा ओवरटाइम नहीं करवाया जाएगा।
धारा-8:
- साप्ताहिक अवकाश दिन।
- एक सप्ताह व एक सम्पूर्ण दिन का अवकाश दिया जाएगा।
धारा-9:
- निरीक्षक को सूचना।
- प्रत्येक अधिवक्ता किसी स्थापन में किसी बालक को नियोजित किए जाने के 30 दिन के अन्दर निरीक्षक को लिखित में सभी सूचनाएँ भेजेगा, यदि वह असमर्थ है तो विधिक सहायता प्राधिकरण उन्हें वकील उपलब्ध कराएगा।
धारा-10:
- आयु के बारे में विवाद।
- आयु संबंधी प्रमाण-पत्र के अभाव में निरीक्षक द्वारा चिकित्सा प्राधिकारी की रिपोर्ट मान्य होगी।
धारा-11:
- रजिस्टर का रखा जाना।
- रजिस्टर में बालक का नाम, जन्म तिथि, काम की प्रकृति, काम की समयावधि एवं विश्राम काल का विवरण होगा।
धारा-12:
- धारा-3 एवं धारा-4 की संक्षिप्ति को अंतर्विष्ट करने वाली सूचना का संप्रदर्शन।
धारा-13:
- स्वास्थ्य एवं सुरक्षा संबंधी प्रावधान।
अध्याय-4 : प्रकीर्ण
धारा-14:
- दण्ड का प्रावधान।
- न्यूनतम 3 माह का कारावास।
- अधिकतम 1 वर्ष का कारावास।
- जुर्माना – 10 से 20 हजार तक।
- दुबारा अपराध करने पर न्यूनतम 6 माह एवं अधिकतम 2 वर्ष तक का कारावास।
धारा-15:
- शास्तियों के संबंध में कुछ विधियों का उपांतरित रूप में लागू होना।
धारा-16:
- अपराधों से संबंधित प्रक्रिया।
- किसी बालक की आयु के बारे में प्रत्येक प्रमाण-पत्र चिकित्सा प्राधिकारी द्वारा दी गई रिपोर्ट ही मान्य होगी।
- महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के अवसर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचरण नहीं करेगा।
धारा-17:
- निरीक्षक की नियुक्ति।
धारा-18:
- नियम बनाने की शक्ति।
धारा-19:
- नियमों एवं अधिसूचनाओं का संसद या राज्य विधानमण्डल के समक्ष रखा जाना।
- इस अधिनियम के अधीन किसी राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के बाद उस राज्य के विधानमण्डल के समक्ष रखा जाएगा।
धारा-20:
- विधि के कुछ अन्य उपबंधों का वर्जित न होना।
धारा-21:
- कठिनाईयों को दूर करने की शक्ति।
धारा-22:
- निरसन एवं व्यावृत्ति।
- बालक नियोजन अधिनियम, 1938 (1938 का 26) इसके द्वारा निरसित किया जाता है।
- इस प्रकार निरसित अधिनियम के अधीन की गई कोई बात या कार्यवाही, जहाँ तक वह इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी।
महत्वपूर्ण संशोधन
बालश्रम (निषेध एवं नियमन) अधिनियम, 1986 में संशोधन:
- खतरनाक व्यवसायों की संख्या घटाकर 83 से (3) कर दी गई है:
- उत्खनन
- ज्वलनशील पदार्थ
- कारखाना अधिनियम के तहत खतरनाक प्रक्रियाएँ
बालश्रम (निषेध एवं नियमन) संशोधन अधिनियम, 2006:
- 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम करवाना संज्ञेय अपराध माना जाएगा।
- इस अधिनियम में पुनर्वास कोष का सृजन करने का प्रावधान किया जाएगा, यह पुनर्वास कोष बच्चों के पुनर्वास के लिए होगा।
बालक एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016
- प्रभावी तिथि: 1 सितंबर 2016 से
- ने 1986 के मूल अधिनियम में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए।
1. अधिनियम का नाम परिवर्तन:
- अधिनियम का शीर्षक “बालक श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986” से बदलकर “बालक एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986” कर दिया गया।
- यह ‘किशोर’ श्रेणी को शामिल करने के महत्त्व को दर्शाता है।
2. 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के नियोजन पर पूर्ण प्रतिबंध:
- अधिनियम की धारा 3 के अनुसार, किसी भी बच्चे (वह व्यक्ति जिसने अपनी चौदह वर्ष की आयु पूरी नहीं की है) को किसी भी व्यवसाय या प्रक्रिया में नियोजित नहीं किया जाएगा।
- यह एक व्यापक प्रतिबंध है जो सभी आर्थिक गतिविधियों को कवर करता है।
3. दो प्रमुख अपवाद (आधिकारिक स्पष्टीकरण):
A. पारिवारिक उद्यम:
- जहाँ बच्चा अपने परिवार (माता-पिता या उसके रिश्तेदारों) की सहायता करता है।
- शर्तें:
- यह सहायता स्कूल के घंटों के बाद या छुट्टियों के दौरान होनी चाहिए
- खतरनाक प्रकृति की नहीं होनी चाहिए
B. ऑडियो-विजुअल उत्पादन:
- जहाँ बच्चा एक कलाकार के रूप में काम करता है (जैसे फिल्म, टेलीविजन सीरियल, विज्ञापन या कोई अन्य मनोरंजन उद्योग में)
- शर्तें:
- यह काम बच्चे की स्कूली शिक्षा में बाधा न डाले
- काम के घंटों का भी ध्यान रखा जाए
उद्देश्य:
- इन अपवादों का उद्देश्य पारंपरिक कौशल को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने और कलात्मक प्रतिभाओं को निखारने में मदद करना है
- साथ ही यह सुनिश्चित करना कि बच्चे की शिक्षा या स्वास्थ्य प्रभावित न हो
4. किशोरों की श्रेणी का परिचय और उन पर प्रतिबंध:
A. किशोर की परिभाषा (धारा 2 (1)):
- अधिनियम 14 से 18 वर्ष की आयु वर्ग के व्यक्ति को “किशोर” के रूप में परिभाषित करता है।
B. खतरनाक व्यवसायों/प्रक्रियाओं में प्रतिबंध (धारा 3A):
- किशोरों को अब अनुसूची में उल्लिखित किसी भी खतरनाक व्यवसाय या प्रक्रिया में काम करने से प्रतिबंधित किया गया है।
- वर्ष 2016 के संशोधन के बाद, खतरनाक व्यवसायों की संख्या घटाकर 3 कर दी गई है:
- उत्खनन (खनन)
- ज्वलनशील पदार्थों से संबंधित काम
- खतरनाक प्रक्रियाओं से संबंधित कोई भी प्रक्रिया
- नोट: खतरनाक प्रक्रियाओं की संख्या अभी भी अनुसूची में सूचीबद्ध है।
- पहले: यह सूची काफी लंबी थी (83 व्यवसाय और 99 प्रक्रियाएँ)
- अब: इसे तर्कसंगत बनाया गया है ताकि वास्तविक रूप से खतरनाक कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया जा सके।
- श्रम और रोजगार मंत्रालय की आधिकारिक सूचनाओं के अनुसार, केंद्र सरकार एक तकनीकी सलाहकार समिति (Technical Advisory Committee) की सिफारिश पर इन खतरनाक व्यवसायों और प्रक्रियाओं की सूची को संशोधित कर सकती है।
C. ILO कन्वेंशन से जुड़ाव:
- यह संशोधन ILO कन्वेंशन 182 (सबसे खराब बाल श्रम रूपों का निषेध) और ILO कन्वेंशन 138 (रोजगार के लिए न्यूनतम आयु) के अनुरूप है
- जिसमें 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को खतरनाक काम से प्रतिबंधित किया गया है
5. दंड में वृद्धि (धारा 14):
प्रथम अपराध:
- कारावास की अवधि 6 महीने से कम नहीं होगी, जो 2 वर्ष तक बढ़ सकती है
- जुर्माना ₹20,000 से कम नहीं होगा, जो ₹50,000 तक हो सकता है
- या दोनों
द्वितीय या बाद का अपराध:
- कारावास की अवधि 1 वर्ष से कम नहीं होगी, जो 3 वर्ष तक बढ़ सकती है
माता-पिता/अभिभावक के लिए (धारा 14B):
- यदि कोई माता-पिता या अभिभावक अपने बच्चे या किशोर को अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए काम करने की अनुमति देता है:
- प्रथम अपराध: कोई दंड नहीं
- द्वितीय या बाद का अपराध: ₹10,000 तक का जुर्माना
- उद्देश्य: यह प्रावधान माता-पिता पर अत्यधिक बोझ डाले बिना जागरूकता बढ़ाने और जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से है
6. अपराधों का संज्ञेय होना (धारा 14A):
- इस अधिनियम के तहत किए गए सभी अपराधों को अब संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) बनाया गया है
- मतलब: पुलिस बिना वारंट के किसी संदिग्ध को गिरफ्तार कर सकती है और मजिस्टेट की अनुमति के बिना ही जांच शुरू कर सकती है
- लाभ: अपराधों पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करता है
7. बाल एवं किशोर श्रम पुनर्वास निधि (धारा 14C):
- अधिनियम एक पुनर्वास निधि के निर्माण का प्रावधान करता है
- निधि में जमा: दोषी नियोक्ताओं से वसूल किया गया जुर्माना
- उपयोग: बाल एवं किशोर श्रमिकों के बचाव और पुनर्वास के लिए
- शामिल: उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक एकीकरण
अधिनियम के तहत विनियमित कार्य की शर्तें
जहाँ बच्चों को कानूनी रूप से काम करने की अनुमति है (जैसे पारिवारिक उद्यमों में या कलाकार के रूप में), वहाँ उनकी सुरक्षा और शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त शर्तें लगाई गई हैं:
1. कार्य के घंटे (धारा 7):
- कोई भी बच्चा एक दिन में 3 घंटे से अधिक काम नहीं करेगा
- लगातार काम के 3 घंटे के बाद कम से कम 1 घंटे का आराम अनिवार्य है
- आराम के समय सहित कुल काम का समय (जो दिन में स्कूल से पहले या बाद में किया जा सकता है) 6 घंटे से अधिक नहीं होगा
2. कार्य समय पर प्रतिबंध (धारा 7):
- कोई भी बच्चा शाम 7 बजे से सुबह 8 बजे के बीच काम नहीं करेगा
3. अति समय (Overtime) पर पूर्ण प्रतिबंध (धारा 7):
- किसी भी बच्चे से ओवरटाइम काम करने की उम्मीद या अनुमति नहीं दी जाएगी
4. दोहरे रोजगार पर प्रतिबंध (धारा 7):
- किसी भी बच्चे को एक ही दिन में एक से अधिक प्रतिष्ठानों में काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी
5. साप्ताहिक अवकाश (धारा 8):
- प्रत्येक बच्चे को सप्ताह में कम से कम एक पूरे दिन का अवकाश दिया जाएगा
6. रजिस्टर का रखरखाव (धारा 11):
- नियोक्ता को एक रजिस्टर रखना अनिवार्य है
- रजिस्टर में दर्ज: काम करने वाले प्रत्येक बच्चे का नाम, जन्मतिथि, पता, काम के घंटे, अवकाश आदि का विवरण
अधिनियम का महत्त्व और चुनौतियाँ
महत्त्व:
- बाल श्रम के खिलाफ मजबूत कानूनी ढाँचा: यह भारत में बाल श्रम के उन्मूलन के लिए सबसे व्यापक कानूनों में से एक है
- किशोरों का संरक्षण: 14-18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक काम से प्रतिबंधित करके, यह अधिनियम अब अधिक व्यापक सुरक्षा प्रदान करता है
- अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का पालन: यह ILO के प्रमुख बाल श्रम कन्वेंशनों के अनुरूप है
- कठोर दंड: उल्लंघनकर्ताओं के लिए दंड में वृद्धि एक मजबूत निवारक के रूप में कार्य करती है
- पुनर्वास पर जोर: पुनर्वास निधि का प्रावधान बचाए गए बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने में मदद करता है
चुनौतियाँ:
- पारिवारिक उद्यमों में छूट का दुरुपयोग: यह एक बड़ी चिंता का विषय है कि इस प्रावधान का दुरुपयोग कर बच्चों से अमानवीय परिस्थितियों में काम करवाया जा सकता है, विशेषकर असंगठित क्षेत्र में जहाँ निगरानी कठिन है
- प्रवर्तन की समस्याः कानूनों का प्रभावी प्रवर्तन सुनिश्चित करना एक चुनौती है, खासकर दूरदराज के क्षेत्रों और छोटे व्यवसायों में
- सामाजिक-आर्थिक कारक: गरीबी और शिक्षा का अभाव बाल श्रम के मूल कारण हैं, जिन्हें केवल कानूनी प्रावधानों से पूरी तरह से हल नहीं किया जा सकता है
- जागरूकता की कमी: नियोक्ता, माता-पिता और स्वयं बच्चों के बीच अधिनियम के प्रावधानों और उनके अधिकारों के बारे में जागरूकता की कमी एक बड़ी बाधा है
