भारतीय संविधान निर्माण का ऐतिहासिक विकास | नोट्स

📜 संविधान निर्माण के ऐतिहासिक कदम

भारतीय संविधान का विकास · ऐतिहासिक अधिनियमों की यात्रा

⚖️ किसी देश का संविधान उस देश की शासन व्यवस्था को सुगमतापूर्वक एवं सुचारू रूप से चलाने वाले नियमों एवं विनियमों का संग्रह होता है। इसे देश की 'आधारभूत विधि' कहा जा सकता है।

📖 संवैधानिक इतिहास

भारतीय संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है जिसका निर्माण एक संविधान निर्मात्री सभा द्वारा किया गया। इस संविधान के निर्माण का इतिहास निम्न है-

🏛️ रेग्यूलेटिंग एक्ट, 1773

भारतीय संविधान के विकास की प्रक्रिया का प्रारम्भिक चरण 21 जून, 1773 को लागू किए गए 'रेग्यूलेटिंग एक्ट' को माना जाता है। यह अधिनियम तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड नॉर्थ के काल में पारित हुआ एवं लागू किया गया था। इसके द्वारा भारत में केन्द्रीय प्रशासन की नींव रखी गई। इसके तहत बंगाल के 'गवर्नर' को 'गवर्नर जनरल' का पदनाम देकर उसे तीनों प्रेसीडेन्सियों- बंगाल, मद्रास व बम्बई का गवर्नर जनरल बनाया गया तथा बम्बई व मद्रास के गवर्नरों को बंगाल के ' गवर्नर जनरल' के अधीन कर दिया गया। बंगाल के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स बने। इससे भारतीय प्रान्तों के एकीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। कलकत्ता में (1774 में) एक उच्चतम-न्यायालय की स्थापना की गई।

⚙️ 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट

ब्रिटिश संसद ने 1784 में 'पिट्स इंडिया एक्ट' पारित किया। उस समय भारतीय गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स थे। इस अधिनियम द्वारा कम्पनी के 'संचालक मंडल' के नियंत्रण हेतु उसके ऊपर 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' की स्थापना की गई एवं ब्रिटिश सरकार को भारत में कम्पनी के कार्यकलापों और इसके प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया।

इस अधिनियम द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासनिक कार्यों का पृथक्करण किया गया अर्थात् कम्पनी के व्यापारिक व राजनैतिक कार्यों को अलग-अलग कर दिया गया।

कम्पनी के व्यापारिक मामलों का संचालन प्रतिनिधि संचालक-मण्डल अथवा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के द्वारा किया जाता था तथा कंपनी के राजनीतिक मामलों के संचालन के लिए एक नियंत्रक-मण्डल अथवा बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल की व्यवस्था की गई अर्थात् इस अधिनियम द्वारा कम्पनी के मामलों में द्वैध शासन व्यवस्था लागू हो गई।

1786 से 1857 के दौरान ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सम्बन्धित चार अधिनियम पारित करवाये जो चार्टर अधिनियम कहलाये। जो इस प्रकार हैं- पहला 1793 का चार्टर अधिनियम, दूसरा 1813 का चार्टर अधिनियम, तीसरा 1833 का चार्टर अधिनियम और चौथा 1853 का चार्टर अधिनियम।

📌 1833 का चार्टर अधिनियम

ब्रिटिश भारत के केन्द्रीयकरण की दिशा में यह कानून निर्णायक कदम था।

इसके तहत बंगाल के गवर्नर जनरल को सम्पूर्ण ब्रिटिश भारत का 'गवर्नर जनरल' बना दिया गया। भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक बने ।

कम्पनी के व्यापारिक अधिकार समाप्त कर दिए गए और उसे भविष्य में केवल राजनीतिक कार्य ही करने थे।

📜 1853 का चार्टर अधिनियम

संवैधानिक विकास की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण अधिनियम था। इसकी विशेषताएँ निम्न थी-

  • इसने पहली बार गवर्नर जनरल की परिषद के विधायी और प्रशासनिक कार्यों को पृथक-पृथक कर दिया व गवर्नर जनरल के लिए नई विधान परिषद्- 'भारतीय केन्द्रीय विधान परिषद' का गठन किया।
  • सिविल सेवकों की भर्ती एवं चयन हेतु खुली प्रतियोगिता व्यवस्था का शुभारम्भ हुआ। इस प्रकार 'विशिष्ट सिविल सेवा' भारतीय नागरिकों के लिए खोल दी गई।
👑 भारत सरकार अधिनियम, 1858

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के असफल होने के बाद ब्रिटिश संसद द्वारा पारित इस अधिनियम के तहत भारत में कम्पनी का शासन समाप्त कर भारत का शासन सीधे 'ब्रिटिश ताज' के अधीन किया गया अर्थात् भारत का शासन प्रत्यक्षतः ब्रिटिश सरकार के हाथों में दे दिया था।

इसके अनुसार ब्रिटिश क्राउन की शक्तियों का प्रयोग नवसृजित पद 'भारत मंत्री' या 'भारत सचिव' द्वारा किया जाना था, जो भारतीय प्रशासन के लिए ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी होता था। 'भारत-सचिव' ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल का सदस्य होता था।

'गवर्नर जनरल' का पदनाम बदलकर 'वायसराय एवं गवर्नर जनरल' किया गया। लॉर्ड केनिंग भारत के प्रथम 'वायसराय एवं गवर्नर जनरल' बने। 1 नवम्बर, 1858 को महारानी विक्टोरिया द्वारा उद्घोषणा की गई।

भारत शासन अधिनियम 1858 को 'भारत के शासन को अच्छा बनाने वाला अधिनियम' अर्थात् 'एक्ट फॉर दी बेटर गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया' की संज्ञा दी गई।

🏛️ 1861 का भारतीय परिषद अधिनियम

1861 का भारतीय परिषद अधिनियम भारतीय संवैधानिक एवं राजनैतिक इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण अधिनियम था। जिसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न थी-

  • कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने की शुरुआत की गई।
  • बम्बई व मद्रास प्रेसिडेंसियों की विधायी शक्तियों को पुनः वापस कर शक्तियों के विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भकी गई।
  • इसके तहत बंगाल, उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब में विधान परिषद का गठन हुआ।
🗳️ 1892 का भारतीय परिषद अधिनियम

इसके तहत परोक्ष निर्वाचन पद्धति को लाया गया। विधान परिषद को बजट पर विचार-विमर्श करने तथा कार्यपालिका से प्रश्न करने की शक्ति प्रदान की गई।

⚖️ 1909 का भारत परिषद अधिनियम (मॉर्ले-मिंटो सुधार अधिनियम)

सन् 1909 में लॉर्ड मिण्टो द्वारा मॉर्ले-मिण्टो सुधार अधिनियम पारित किया। भारत सचिव जॉन मॉर्ले व वॉयसराय लॉर्ड मिण्टो -II द्वारा प्रस्तुत इस अधिनियम में विधान परिषदों के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन तथा प्रथम बार मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई। इस प्रकार इस साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली ने ही आगे भारत विभाजन की नींव डाली। लॉर्ड मिण्टो को 'साम्प्रदायिक निर्वाचक मंडल' के जनक के रूप में जाना जाने लगा। यह अधिनियम अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति को चरितार्थ करता है। इसके अन्य प्रावधान थे-

  • केन्द्रीय विधान परिषद का नाम 'औपनिवेशिक विधान परिषद' (Imperial Legislative Council) रखा गया।
  • इस अधिनियम के अन्तर्गत पहली बार किसी भारतीय को वायसराय और गवर्नर की कार्यकारी परिषद में शामिल करने का प्रावधान किया गया। सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा वायसराय की कार्यपालिका परिषद के प्रथम भारतीय सदस्य (विधि सदस्य) बने।

Scroll to Top