पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकी मुद्दे

पर्यावरण

  • पर्यावरण अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘Environment’ का हिन्दी अर्थ है। जो फ्रेंच शब्द Environ से बना है।
  • Environ का अर्थ होता है- आसपास का आवरण।
  • हिन्दी शब्द पर्यावरण (परि+आवरण) का अर्थ होता है चारों तरफ, आवरण अर्थात् प्रकृति में जो भी चारों तरफ परिलक्षित है वह पर्यावरण में शामिल होता है; जैसे वायु, जल, मिट्टी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु सभी पर्यावरण के अंग है।
  • के. हेविट तथा एफ.के. हेयर ने अपने शोथ लेख ‘man and environment; conceptual framework’ (Commission on college geography Resource paper, 20) में सर्वप्रथम पर्यावरण भूगोल शब्दावली का 1973 में प्रयोग किया।

पर्यावरण भूगोल

  • जल तथा वायु के सम्मिलन से निर्मित पृथ्वी के चारों ओर व्यापक मोटी परत जो सभी प्रकार के जीवों (मानव, जंतु व वनस्पति) को पोषण करती है इसे जीव मण्डल कहते है।
  • इस जीवनदायी जीवमण्डल में बिना किसी रक्षा के सभी प्रकार के जीवनरूप संभव होते है।
  • यह जीवमण्डल उच्च स्तरीय भू-पारिस्थितक तंत्र है जो पर्यावरण भूगोल के अंतर्गत आते है।
  • पर्यावरण भूगोल का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित है-

1. मानव एवं पर्यावरण के मध्य संबंधों एवं अंतर्संबंधों के बारे में अध्ययन करना।

2. भौतिक एवं जैविक पराक्रमों के मध्य स्तरों का अध्ययन करना।

3. प्राकृतिक पर्यावरण के विभिन्न संगठनों का अध्ययन करना।

पर्यावरण के घटक तथा कारक

A. जैविक पर्यावरण

1. वनस्पति

2. जंतु

B.भौतिक (अजैविक) पर्यावरण

1. स्थल

2. वायु

3. जल

पर्यावरण प्रदूषण

“वायु, जल एवं मृदा के भौतिक, रासायनिक व जैविक गुणों में होने वाला ऐसा अवांछित परिवर्तन जो मनुष्य के साथ ही सम्पूर्ण परिवेश के प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तत्त्वों को हानि पहुँचाता है उसे प्रदूषण कहते हैं।”

प्रदूषक- वे पदार्थ जो प्रदूषण के लिए उत्तरदायी होते हैं, पर्यावरण प्रदूषक कहलाते हैं।

प्रदूषण के प्रकार –

प्रदूषकों की प्रकृति के आधार पर प्रदूषण को विभिन्न प्रकारों में समझा जा सकता है-

(1) वायु प्रदूषण

(ii) जल प्रदूषण

(iii) ध्वनि प्रदूषण

(iv) मृदा प्रदूषण (भूमि प्रदूषण)

(v) वाहन प्रदूषण

(vi) विकिरणीय प्रदूषण

(vii) तापीय प्रदूषण

(viii) औद्योगिक प्रदूषण

(ix) कूड़े-कचरे से प्रदूषण

(x) समुद्रीय प्रदूषण

(xi) घरेलू अपशिष्ट के कारण प्रदूषण।

वायु प्रदूषण

  • समस्त जीव जगत के लिए वायु आवश्यक है उसके बिना जीवन सम्भव नहीं है।
  • वायुमण्डल में विद्यमान प्रमुख गैसें नाइट्रोजन (78.08%), ऑक्सीजन (20.94%), ऑर्गन (0.93%), कार्बन डाई ऑक्साइड (0.03%) इत्यादि है। इन गैसों के अनुपात में थोड़ा भी परिवर्तन वायुमण्डल की सम्पूर्ण व्यवस्था को प्रभावित करता है, जिसका परोक्ष व अपरोक्ष प्रभाव जीव जगत पर पड़ता है। इसे वायु प्रदूषण कहते हैं।
  • वायु प्रदूषण को स्रोत के आधार पर दो भागों में विभाजित किया जाता है-
  • (1) प्राकृतिक प्रदूषण
  • (2) अप्राकृतिक प्रदूषण
  • (1) प्राकृतिक प्रदूषण –  यह प्रकृति की देन है। ज्वालामुखी उद्‌गार से निकले पदार्थ, धूलभरी आँधिया, तूफान, दावानल, भूस्खलन आदि प्राकृतिक क्रियाओं से प्रदूषण होता है।
  • (2) अप्राकृतिक कारण – वायु को प्रदूषित करने में सबसे बड़ा योगदान स्वयं मानव का ही है। घरों में जलाने वाला ईंधन, उद्योग, परिवहन साधन, धूम्रपान, रसायनों का उपयोग, रेडियो धर्मिता जैसे उपयोगों से सर्वाधिक प्रदूषण हो रहा है।

वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव

  • मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
  • वनस्पति पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। जीव जन्तु एवं कीटों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है।
  • जलवायु एवं वायुमण्डलीय दशाओं पर प्रतिकूल प्रभाव, जलवायु परिवर्तन, ओजोन’ परत में क्षरण, ग्रीन हाउस प्रभाव, मौसम पर प्रभाव।
  • महानगरों एवं नगरों पर कोहरे के गुम्बद बन जाते हैं।

वायु प्रदूषण के नियन्त्रण हेतु उपाय

  • प्रदूषण रोकने के लिए वृक्षारोपण करना।
  • वाहनों के प्रदूषण पर नियन्त्रण किया जाए।
  • ईंट भट्टों व बर्तन बनाने व पकाने जैसे उद्योगों को शहर से बाहर स्थापित किया जाए।
  • उद्योग में नवीन तकनीक का उपयोग किया जाए।
  • वायु प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और उन्मूलन के उद्देश्य से वर्ष 1981 में संसद द्वारा बनाएं गए वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम को कठोरता से लागू किया जाए।

मृदा प्रदूषण

जब भूमि में प्रदूषित जल, रसायनयुक्त कीचड़, कूड़ा, कीटनाशक दवा और उर्वरक अत्यधिक मात्रा में प्रवेश कर जाते हैं तो उससे भूमि की गुणवत्ता घट जाती है। इसे मृदा प्रदूषण कहा जाता है।

मृदा-प्रदूषण के कारण

  • 1. कीटनाशक व उर्वरक –  कीटनाशक व उर्वरक मृदा-प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। इनके प्रयोग से फसलों की प्राप्ति तो हो जाती है, लेकिन जब वे तत्त्व भूमि में एकत्र हो जाते हैं तो मिट्टी के सूक्ष्म जीवों का विनाश कर देते हैं। इससे मिट्टी का तापमान प्रभावित होता है और उसके पोषक तत्त्वों के गुण समाप्त हो जाते हैं।
  • 2. घरेलू अवशिष्ट – कूड़ा-कचरा, गीली जूठन, रद्दी, कागज, पत्तियाँ, गन्ना-अवशिष्ट, लकड़ी, कांच व चीनी मिट्टी के टूटे हुए बर्तन, चूल्हे की राख, कपड़े, टीन के डिब्बे, सड़े-गले फल व सब्जियाँ, अंडों के छिलके आदि अनेक प्रकार के व्यर्थ पदार्थ मिट्टी में मिलकर मृदा-प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं।
  • 3. औद्योगिक अवशिष्ट – उद्योगों से निकल व्यर्थ पदार्थ किसी न किसी रूप में मृदा-प्रदूषण का कारण बनते हैं।
  • 4. नगरीय अवशिष्ट – इसके अन्तर्गत मुख्यतः कूड़ा-करकट, मानव मल, सड़े-गले फल व सब्जियों का कचरा, बाग-बगीचों का कचरा, उद्योगों, सड़कों, नालियों व गटरों का कचरा, मांस व मछली बाजार का कचरा, मरे हुए जानवर व चर्मशोधन का कचरा आदि को सम्मिलित किया जाता है। इन सबसे मृदा-प्रदूषण होता है।

मृदा-प्रदूषण नियंत्रण के उपाय

  • व्यर्थ पदार्थों व अवशिष्टों का समुचित निक्षेपण किया जाना चाहिए।
  • कृषि कार्यों में डी.डी.टी., लिण्डेन, एल्ड्रिन तथा डीलिडून आदि प्रयोग पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।
  • अस्वच्छ शौचालयों के स्थान पर स्वच्छ शौचालयों का निर्माण करना चाहिए।
  • नागरिकों में सफाई के प्रति चेतना जाग्रत करनी चाहिए।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना

  • इस योजना की शुरुआत 19 फरवरी, 2015 को सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) से की गई है।
  • मिट्टी की गुणवत्ता की जाँच तथा कृषि उत्पादकता को बढ़ाने हेतु यह योजना लागू की गई।
  • इस योजना का ध्येय वाक्य ‘स्वस्थ धरा खेत हरा’ है।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के लाभ

  • इस योजना के तहत किसानों को अच्छी फसल उगाने में मदद मिलेगी।
  • इससे देश उन्नति की ओर बढ़ेगा और किसानों को आगे बढ़ने के अवसर मिलेगे।
  • इस योजना से किसानों को अपने खेत की मिट्टी के स्वास्थ्य के बारे में सही जानकारी मिलेगी, जिससे वह मनचाहे अनाज, फसल का उत्पादन कर सकेगा।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड हर तीन वर्ष में दिया जाता है जिससे किसानों को अपने खेत की मिट्टी के बदलाव के बारे में पता चलता रहे।

जल प्रदूषण

  • जल में किसी ऐसे बाहरी पदार्थ की उपस्थिति, जो जल के स्वाभाविक गुणों को इस प्रकार से परिवर्तित कर दे कि जल स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो जाए या उसकी उपयोगिता कम हो जाए, जल प्रदूषण कहलाता है।
  • जल प्रदूषण के नियंत्रण और रोकथाम तथा देश में पानी की उच्च गुणवत्ता बनाए रखने हेतु इसे वर्ष 1974 में अधिनियमित किया गया था।
  • जल प्रदूषण के स्रोत अथवा कारण –

जल प्रदूषण के स्रोतों अथवा कारणों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है।

1. प्राकृतिक स्रोत

2. मानवीय स्रोत।

1. जल प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोत

कभी-कभी भूस्खलन के दौरान खनिज पदार्थ, पेड़-पौधों की पत्तियाँ जल में मिल जाती हैं जिससे जल प्रदूषण होता है।

2. जल प्रदूषण के मानवीय स्रोत

जल प्रदूषण के मानवीय स्रोत अथवा कारण हैं-

1. घरेलू बहिःस्राव

2. वाहित मल

3. कृषि बहिःस्राव

4. औद्योगिक बहिःस्राव

5. तेल प्रदूषण

6. तापीय प्रदूषण

जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की समस्याएँ –

सुपोषण/यूट्रोफिकेशन –
  • घरेलू अपशिष्ट, नाइट्रोजन और फॉस्फेट की बहुलता वाले उर्वरक के अंश, भू-स्राव और औद्योगिक कचरा जब जल निकायों में मिलता है तो जल निकायों में बड़ी तीव्रता में पोषकों की वृद्धि होती है। जल में अधिक पोषक समृद्धि होने से डकवीड, वॉटर हायसिंथ (जलकुम्भी), फाइटोप्लॅक्टन और दूसरी जलीय वनस्पतियों तथा सूक्ष्म जलीय जीवों की वृद्धि होती है जिसके कारण जल में घुली हुई ऑक्सीजन की माँग बढ़ जाती है।
  • पोषक तत्त्वों की अधिकता से शैवालों की तीव्र वृद्धि होती है जिससे सूर्य का प्रकाश जलीय पौधों तक नहीं पहुँच पाता है और उनकी मृत्यु होने लगती है। मरे हुए सड़े-गले पौधो और जैविक पदार्थों के सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटन से पानी में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है जिसके कारण बड़ी संख्या में जलीय जीवों का नाश होता है।
  • पौधो के मरने और सड़ने-गलने से एक अप्रिय गंध पैदा होती है और वह जल मनुष्य के प्रयोग योग्य नहीं रहता। पादप प्लवकों और शैवालों के बहुत अधिक और अचानक वृद्धि से पानी का रंग परिवर्तित हो जाता है। जिसे वॉटर ब्लूम नाम से जाना जाता है इसे एल्गल ब्लूम भी कहते हैं। यह पौधा पानी में विषाक्त तत्त्व छोड़ता है जिसके कारण बड़ी संख्या में मछलियाँ मरती है। जलसंकाय की इसी पोषक समृद्धि को सुपोषण कहते हैं। देश में झीलों और जलसंकायों में यूट्रोफिकेशन की बढ़ती प्रवृत्ति के लिए मानव गतिविधियों उत्तरदायी हैं।

सुपोषण के प्रकार

1.प्राकृतिक सुपोषण

जब सुपोषण प्राकृतिक रूप से होता है अर्थात् मानवीय हस्तक्षेप के बिना सम्पन्न होता है तो उसे प्राकृतिक सुपोषण कहते हैं। यह प्रक्रिया कई वर्षों तक चलती है। इस प्रक्रिया में पहले शैवाल धाराओं में उत्पन्न होकर वृद्धि करते हैं तथा धीरे-धीरे झीलों में इनकी वृद्धि होती जाती है।

2.मानव निर्मित सुपोषण

इसमें मानवीय गतिविधियों के कारण सुपोषण की गति में वृद्धि हो जाती है। घरेलू अपशिष्ट, कृषि व शहरी अपशिष्ट के कारण पोषक तत्त्वों में तीव्र वृद्धि हो जाती है जिससे शैवालों की वृद्धि से सुपोषण क्रिया होती है। यह सुपोषण क्रिया कुछ वर्षों में पूरी हो जाती है।

सुपोषण के स्रोत

1. बिन्दु स्रोत

अपशिष्ट जल प्रवाह (औद्योगिक व नगरीय)

पशुओं का अपशिष्ट

खनन उद्योग, गैर-निपटान औद्योगिक कचरा

2. गैर-बिन्दु स्रोत

कृषि क्षेत्र व सिंचाई अपवाह

भूमि पर घटित घटनाएँ

औद्योगिक इकाइयों से अप्रत्यक्ष रूप से आया अपशिष्ट

सुपोषण को नियंत्रित करने के उपाय

  • स्वीडन में गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय के शोधकताओं ने बताया कि
  • समुद्र तल से नीचे ऑक्सीजन युक्त पंप द्वारा यूट्रोफिकेशन पर नियंत्रण किया जा सकता है।
  • पोषक तत्त्वों पर नियंत्रण (जल में इसकी अत्यधिक मात्रा को रोकने का प्रयास)।
  • शैवाल फिल्ट्रेशन
  • अल्ट्रासोनिक रेडिएशन
  • अपशिष्ट निपटारा व जलीय पारितंत्र में मानवीय हस्तक्षेप को कम करना।
  • कृषि में आवश्यक तत्त्वों का प्रयोग
  • नॉन-पॉइंट व पॉइंट स्रोत द्वारा सुपोषण पर नियंत्रण
  • सरकारी प्रयास व स्थानीय लोगों में शिक्षा व प्रशिक्षण द्वारा जागरूकता।

जल प्रदूषण का प्रभाव –

  • जल प्रदूषण का प्रभाव बहुत ही खतरनाक होता है। इससे मानव तो बुरी तरह प्रभावित होता ही है, जलीय जीव-जन्तु, जलीय पादप तथा पशु-पक्षी भी प्रभावित होते हैं।
  • 1. जलीय जीव-जन्तुओं पर प्रभाव
  • 2. जलीय पादपों पर प्रभाव
  • 3. पशु-पक्षियों पर प्रभाव
  • 4. मानव पर प्रभाव
  • 5. जल प्रदूषण के कुछ अन्य प्रभाव
  • (i) पेयजल का अरुचिकर तथा दुर्गन्धयुक्त होना
  • (ii) सागरों की क्षमता में कमी
  • (iii) उद्योगों की क्षमता में कमी

जल प्रदूषण बचाव के उपाय –

  • सभी नगरों में जल-मल के निस्तारण हेतु सीवर शोधन संयंत्रों की स्थापना की जाए।
  • रासायनिक कृषि के स्थान पर जैविक खाद की खेती को प्रोत्साहित किया जाए।
  • औद्योगिक अपशिष्ट युक्त जल को उपचारित कर वहीं पुनः उपयोग लिया जाए।
  • मृत पशुओं के नदी में विसर्जन पर पूर्ण रोक हो और विद्युत शव गृहों की स्थापना की जाए।
  • 300 नमामी गंगे प्रोजेक्ट लॉन्च भारत सरकार ने नमामी गंगे प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए 1 जुलाई 2016 को देशभर में एक साथ 300 प्रोजेक्ट शुरू किए जो गंगा नदी के किनारे शुरू हो रहे है। इनके अन्तर्गत घाटों का आधुनिकीकरण करने के साथ-साथ नदी के किनारों पर वृक्षारोपण किया जाएगा।

ध्वनि प्रदूषण

  • ध्वनि प्रदूषण या अत्यधिक शोर जो मानव जाति और जीव-जन्तुओं के लिए अनुपयोगी हो, उसे ध्वनि प्रदूषण कहते हैं।
  • दुनिया भर में सर्वाधिक ध्वनि प्रदूषण परिवहन प्रणाली जैसे मोटर वाहन, वैमानिक शोर-शराबा, रेल परिवहन इत्यादि से होता है।
  • ध्वनि प्रदूषण से प्रकृति के स्वास्थ्य एवं व्यवहार दोनों प्रभावित होते हैं।
  • ध्वनि प्रदूषण से चिड़चिड़ापन, आक्रामकता, उच्च रक्तचाप, तनाव, श्रवण शक्ति का हास, नींद में गडबडी अन्य हानिकारक प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ते हैं।
  • नोटः- ध्वनि की तीव्रता को मापने की इकाई डेसीबल (Db) होती है।
  • साइलेन्ट जोनः- जहाँ ध्वनि 45 डेसीबल से कम होती है। जैसे -स्कूल, कॉलेज, पार्क, अस्पताल इत्यादि।
  • शोर ध्वनि जोनः- जहाँ ध्वनि 60 डेसीबल से अधिक होती है तो वह ध्वनि प्रदूषण के अंतर्गत आती है।

ध्वनि प्रदूषण के कारण

  • यह परिवहन के साधनों से, स्पीकरों से, उद्योगों से निकलने वाली ध्वनि से, वायुयानों एवं जैट विमानों से, मोटर वाहन, रेल परिवहन इत्यादि से होता है।

ध्वनि प्रदूषण से हानियाँ

मानव के मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे मनुष्यों में चिड़चिड़ापन, बहरापन, अत्यधिक उच्च ध्वनि से व्यक्ति के स्थायी रूप से श्रवण शक्ति समाप्त हो जाती है जिससे व्यक्ति पागल की तरह व्यवहार करने लगता है।

ग्रीन मफलर

ग्रीन मफलर ध्वनि प्रदूषण या अधिक आबादी वाले क्षेत्रों, जैसे- सड़कों के किनारे, रिहायशी इलाकों में स्थित राजमार्गों के आस-पास के क्षेत्रों में 4-6 पंक्तियों में अशोक एवं नीम जैसे पौधों का वृक्षारोपण कर ध्वनि प्रदूषण कम करने हेतु एक युक्ति है।

रेडियोधर्मी प्रदूषण
  • रेडियोधर्मी प्रदूषण ठोस, द्रव, गैसीय पदार्थों में अवांछनीय रेडियोधर्मी पदार्थों की उपस्थिति से होता है, उसे रेडियोधर्मी प्रदूषण कहते हैं।
  • रेडियोधर्मी प्रदूषण के प्रभाव
  • परमाणु विस्फोटों एवं दुर्घटनाओं से जल, वायु एवं भूमि का प्रदूषण होता है।
  • रेडियोधर्मी प्रदूषण के कारण गर्भाशय में शिशुओं की मृत्यु, कैंसर जैसी घातक बीमारी, पेड़-पौधों, जीव-जन्तु, खाद्य सामग्री आदि को
  • प्रभावित करते हैं।
  • रेडियोधर्मी प्रदूषण नियंत्रण के उपाय
  • नाभिकीय बमों, परमाणु बमों तथा रेडियोधर्मी हथियारों, साधनों, तत्त्वों के परीक्षण पर पूर्णतः रोक लगा देनी चाहिए। नाभिकीय संयंत्रों के निर्माण, कार्य एवं सुरक्षा उपायों पर पूर्णतः ध्यान रखना चाहिए।

पर्यावरणीय मुद्दे

मरुस्थलीकरण

  • मानवीय क्रियाकलापों एवं जलवायु परिवर्तन के द्वारा ऊसर, अर्द्ध-ऊसर एवं शुष्क उपार्द्र क्षेत्रों में भूमि अवनयन मरुस्थलीकरण कहलाता है।
  • मरुस्थलीकरण मुख्यतः मानव निर्मित गतिविधियों के परिणामस्वरूप होता है विशेष तौर पर ऐसा अधिक चराई, भूमिगत जल के अत्यधिक इस्तेमाल और मानवीय एवं औद्योगिक कार्यों के लिए नदियों के जल का रास्ता बदलने की वजह से है और यह सारी प्रक्रियाएँ मूलतः अधिक आबादी की वजह से संचालित होती हैं।
    मेडागास्कर की केंद्रीय उच्चभूमि के पठार में, स्वदेशी लोगों द्वारा काटने और जलाने की कृषि पद्धति की वजह से पूरे देश का 10% हिस्सा मरुस्थलीकरण में तब्दील हो गया है।
  • मरुस्थलीकरण कई कारकों द्वारा प्रेरित है, मुख्य रूप से मानव द्वारा की जाने वाली वनों की कटाई के कारण, जिसकी शुरुआत होलोसिन (तकरीबन 10,000 साल पहले) युग में हुई थी और जो आज भी तेज रफ्तार से जारी है।
  • अन्य क्षेत्रों में रेगिस्तान सूखे से अधिक आर्द्र वातावरण के एक क्रमिक संक्रमण द्वारा रेगिस्तान के किनारे का निर्माण कर रेगिस्तान की सीमा को निर्धारित करना अधिक कठिन बना देते हैं।
  • रेत के टीले मानव बस्तियों पर अतिक्रमण कर सकते हैं। रेत के टीले कई अलग-अलग कारणों के माध्यम से आगे बढ़ते हैं, इन सभी को हवा द्वारा सहायता मिलती है।
  • रेत के टीले के पूरी तरह खिसकने का एक तरीका यह हो सकता है कि रेत के कण जमीन पर इस तरह से उछल-कूद कर सकते हैं जैसे-किसी तालाब की सतह पर फेंका गया पत्थर पानी की पूरी सतह पर उछलता है।
  • जब ये उछलते हुए कण नीचे आते हैं तो वे अन्य कणों से टकराकर उनको अपने साथ उछलने का कारण बना सकते हैं। कुछ मजबूत हवाओं के साथ ये कण बीच हवा में टकरा कर चादर प्रवाह (शीट फ्लो) का कारण बनते हैं।
  • सूखा भी मरुस्थलीकरण का कारण बनता है, हालाँकि ई.ओ विल्सन ने अपनी पुस्तक जीवन का भविष्य में कहा है कि सूखा के योगदान कारक होने पर भी मूल कारण मानव द्वारा पर्यावरण के अत्यधिक दोहन से जुड़ा है।
  • शुष्क और अर्द्धशुष्क भूमि में सूखा आम बात हैं और बारिश के वापस आने पर अच्छी तरह से प्रबंधित भूमि का सूखे से पुनरुद्धार हो सकता है। तथापि, सूखे के दौरान भूमि का लगातार दुरुपयोग भूमि क्षरण को बढ़ाता है।
  • 2006 में, वुड्स होल अनुसंधान केंद्र ने अमेज़न घाटी में लगातार दूसरे वर्ष सूखे की सूचना देते हुए और 2002 से चल रहे एक प्रयोग का हवाला देते हुए कहा है कि अपने मौजूदा स्वरूप में अमेज़न जंगल संभावित रूप से रेगिस्तान में बदलने के पहले केवल तीन साल तक ही लगातार सूखे का सामना कर सकता है।
  • ब्राजीलियन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अमेंज़ोनियन रिसर्च के वैज्ञानिकों ने तर्क दिया है कि इस सूखे की यह प्रतिक्रिया वर्षावन (रेनफॉरेस्ट) को “महत्त्वपूर्ण बिंदु” की दिशा में धकेल रही है। यह निष्कर्ष निकाला गया है कि पर्यावरण में CO₂ होने के विनाशकारी परिणामों के साथ जंगल वृक्ष रहित बड़े मैदान (सवाना) या रेगिस्तान परिवर्तित होने के कगार पर जा रहा है, वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (World Wide Fund for Nature) के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई दोनों के संयोजन से मृत पेड़ सूखने लगते हैं और जंगल की आग में ईंधन का काम करते हैं।
  • मरुस्थलीकरण की रोकथाम जटिल और मुश्किल है और तब तक असंभव है जब तक भूमि प्रबंधन की उन प्रथाओं को नहीं बदला जाता जो बंजर होने का कारण बनती हैं।
  • भूमि का अत्यधिक इस्तेमाल और जलवायु में विभिन्नता समान रूप से जिम्मेदार हो सकती है और इनका जिक्र फीडबैक में किया जा सकता है, जो सही शमन रणनीति चुनने में मुश्किल पैदा करते हैं। ऐतिहासिक मरुस्थलीकरण की जाँच विशेष भूमिका निभाती हैं।
  • जो प्राकृतिक और मानवीय कारकों में अंतर करना आसान कर देता है। इस संदर्भ में, जॉर्डन में मरुस्थलीकरण के बारे में हाल के अनुसंधान में मनुष्य की प्रमुख भूमिका पर सवाल उठती है।
  • मरुस्थलीकरण एक ऐतिहासिक घटना है, दुनिया के विशालतम रेगिस्तान समय के लंबे अंतराल में प्राकृतिक प्रक्रिया के परस्पर प्रभाव से निर्मित हुए हैं। इनमें से अधिकांश रेगिस्तान, इस समय के दौरान मानव गतिविधियों से अलग बढ़ और संकुचित हुए हैं।
  • पॉलेओ डेजर्टस (Paleodeserts) रेत के विशाल समुद्र हैं, जो अब वनस्पति की वजह से निष्क्रिय हो गए हैं, सहारा जैसे कुछ मूल रेगिस्तान वर्तमान हाशिए से आगे बढ़ रहे हैं।
  • पश्चिमी एशिया में कई रेगिस्तान क्रीटेशस युग के उत्तरार्द्ध के दौरान प्रागैतिहासिक जातियों एवं उपजातियों की अधिक आबादी की वजह से बने हैं।
  • सहेल मरुस्थल मरुस्थलीकरण का एक और उदाहरण है। सहेल में मरुस्थलीकरण के मुख्य कारण के रूप में काटने और जलाने की खेती को वर्णित किया गया है जिसमें आँधी द्वारा असुरक्षित ऊपरी मिट्टी को हटाने से मिट्टी का अपकर्ष होता है।
  • वर्षा में कटौती भी स्थानीय सदाबहार वृक्षों के विनाश का एक कारण है। सहारा 48 किलोमीटर प्रति वर्ष की दर से दक्षिण की ओर बढ़ रहा है।
  • मध्य एशियाई देश कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, मंगोलिया, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान भी मरुस्थलीकरण से प्रभावित हैं। अफगानिस्तान और पाकिस्तान की भूमि 80% से अधिक ज़मीन भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण का शिकार हो सकती है कज़ाकिस्तान में 1980 के बाद से लगभग आधी से अधिक कृषि योग्य भूमि को त्याग दिया गया है।
  • मरुस्थलीकरण की दर को कम करने के लिए कई प्रकार के तरीकों को आजमाया गया है, तथापि, अधिकांश उपाय रेत की गति का उपचार करते हैं और भूमि के परिवर्तित होने के मूल कारणों जैसे अधिक चराई, अस्थायी कृषि और वनों की कटाई पर काम नहीं करते हैं।
  • मरुस्थलीकरण के खतरे के तहत विकासशील देशों में, बहुत से स्थानीय लोगों का जलाने और खाना पकाने के लिए पेड़ों का उपयोग करना है, जो भूमि क्षरण की समस्या को बढ़ाता है और अक्सर उनकी गरीबी में भी वृद्धि करता है। स्थानीय आबादी ने आगे ईंधन की आपूर्ति हासिल करने के लिए बचे हुए जंगलों पर और अधिक दबाव बना दिया है, जो मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया को और बढाता है।

संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय’ (UnitedNations Convention to Combat Desertification- UNCCD)

  • संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत तीन रियो अभिसमय (Rio Conventions) में से एक है।
  • UNCCD एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जो पर्यावरण एवं विकास के मुद्दों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी है। मरुस्थलीकरण की चुनौती से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 17 जून को ‘विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस’ मनाया जाता है।

द ग्रेट ग्रीन वॉल परियोजना

  • अफ्रीका महाद्वीप के साहेल क्षेत्र में मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए अफ्रीकन यूनियन द्वारा वर्ष 2007 में यह परियोजना प्रारंभ की गई थी।
  • UNCCD के अनुसार यह महत्त्वाकांक्षी परियोजना 22 अफ्रीकी देशों में कार्यान्वित की जा रही है।

बॉन चुनौती

बॉन चुनौती एक वैश्विक प्रयास है। इसके तहत दुनिया के 150 मिलियन हैक्टेयर गैर-वनीकृत एवं बंजर भूमि पर वर्ष 2020 तक और 350 मिलियन हैक्टेयर भूमि पर वर्ष 2030 तक वनस्पतियाँ उगाई जाएगी।

  • पेरिस में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, 2015 में भारत ने स्वैच्छिक रूप से बॉन चुनौती पर स्वीकृति दी थी।
  • भारत ने 13 मिलियन हैक्टेयर गैर-वनीकृत एवं बंजर भूमि पर वर्ष 2020 तक और अतिरिक्त 8 मिलियन हैक्टेयर भूमि पर 2030 तक वनस्पतियाँ उगाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।


मरुस्थलीकरण के प्रमुख कारण

  • 1. औद्योगिक कचरा
  • 2. हवा से मिट्टी का कटाव
  • 3. निर्वनीकरण
  • 4. पानी से मृदा का कटाव

नियन्त्रण के उपाय –

रेतीले टीलों का स्थिरीकरण

  • राजस्थान के 58 प्रतिशत क्षेत्र में अलग-अलग तरह के रेतीले टीले पाए जाते हैं।
  • इन्हें पुरानी और नई दो श्रेणियों के अन्तर्गत रखा जाता है। बारचन और श्रब कापिस टीले नए टीलों की श्रेणी में आते हैं और सबसे अधिक समस्या वाले हैं। अन्य रेतीले टीले पुरानी श्रेणी के हैं और फिर से सक्रिय होने के विभिन्न चरणों में हैं।
  • केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान ने अब रेतीले टीलों को स्थिर बनाने के लिए उपयुक्त टेक्नोलॉजी विकसित की है जिसमें ये बातें शामिल हैं-
  • (1) जैव-हस्तक्षेप से रेतीले टीलों का संरक्षण;
  • (2) टीलों के आधार से शीर्ष तक समानांतर या शतरंज की बिसात के नमूने पर वायु अवरोधकों का विकास;
  • (3) वायु-अवरोधकों के बीच घास और बेल आदि के बीजों का रोपण तथा 5×5 मीटर के अंतर से नर्सरी में उगाए पौधों का रोपण।
  • इसके लिए सबसे उपयुक्त पेड़ और घास की प्रजातियों में इजरायली बबूल (प्रासोपिस जूलीफ्लोरा), फोग (कैलीगोनम पोलीगोनोइड्स), मोपने (कोलोफास्पर्नम मोपने), गुंडी (कोर्डिया मायक्सा), सेवण (लासिउरस सिंडिकस), धामन (सेंक्रस सेटिजेरस) और तुम्बा (साइट्रलस कोलोसिंथिस) शामिल हैं।
  • रेतीले टीलों वाला 80 प्रतिशत क्षेत्र किसानों के स्वामित्व में है और उस पर बरसात में खेती की जाती है।
  • इस तरह के रेतीले टीलों को स्थिर बनाने की तकनीक एक जैसी है मगर समूचे टीले को पेड़ों से नहीं ढँका जाना चाहिए। पेड़ों को पट्टियों की शक्ल में लगाया जाना चाहिए। दो पट्टियों के बीच फसल/घास उगाई जा सकती है।
  • इस विधि को अपनाकर किसान अनाज उगाने के साथ-साथ रेतीले टीलों वाली जमीन को स्थिर बना सकते हैं।

रक्षक पट्टी वृक्षारोपण

  • रेतीली जमीन और हवा की तेज रफ्तार (जो गर्मियों में 70-80 कि.मी. प्रतिघंटा तक पहुँच जाती है) की वजह से खेती वाले समतल इलाकों में काफी मिट्टी का कटाव होता है।
  • कई बार तो मिट्टी का क्षरण 5 टन प्रति हैक्टेयर तक पहुँच जाता है। अगर हवा के बहाव की दिशा में 3 से 5 कतारों में पेड़ लगाकर रक्षक पट्टियाँ बना दी जाए तो मिट्टी का कटाव काफी कम किया जा सकता है।

विमानों से बीजों की बुवाई

  • जमीन की रेतीली प्रकृति के कारण उसमें पानी को रोककर रखने की क्षमता बहुत कम होती है। परिणामस्वरूप बीजों की बुवाई दो-तीन दिन में पूरी करना आवश्यक है ताकि उनका अंकुरण हो सके।
  • विशाल दुर्गम इलाकों में नमी की कमी, वर्षा की अनिश्चितता और रेतीली जमीन की अस्थिरता की वजह से वनीकरण की परम्परागत विधियाँ अपर्याप्त हैं।
  • इसलिए विमानों से बीज गिराकर वन लगाने की विधि अपनाई जा सकती है।
  • यह टेक्नोलॉजी गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे सूखे की आशंका वाले इलाकों में उपयोग में लाई गई है।
  • विभिन्न पेड़ों और घासों के बीजों को आपस में मिलाकर बरसात से पहले या बरसात के बाद विमानों से गिराकर बो दिया जाता है। मिट्टी और गोबर की खाद के साथ बीजों की गोलियाँ बना ली जाती
  • हैं इस विधि से घास और वृक्षों के बीजों का अंकुरण करीब 70-80 प्रतिशत होता है मगर पशुओं को चराने और नमी की अधिकता के कारण अंकुरित बीजों के मुरझाने की दर काफी अधिक हाती है।

सिल्विपाश्चर प्रणाली

  • ईंधन और चारे की जरूरत पूरी करने के लिए पेड़-पौधों तथा वनस्पतियों की अंधाधुंध कटाई से भी मरुस्थलीकरण बढ़ रहा है। इस पर नियन्त्रण के लिए सिल्विपाश्चर प्रणाली वाला दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।
  • इससे धूप और हवा से जमीन के कटाव को कम करने तथा उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलती है।
  • इसके अलावा इससे संसाधनों का संरक्षण करके आर्थिक स्थायित्व भी लाया जा सकता है।
  • अगर अकेसिया टार्टिलिस जैसे पेड़ों से 60 क्विंटल प्रति हैक्टेयर ईंधन और सी. सिलिआरिस जैसी घास से 46 क्विंटल प्रति हैक्टेयर चारा प्राप्त हो सकता है तो दोनों को एक साथ लगाकर 50 क्विंटल प्रति हैक्टेयर ईंधन और 55.8 क्विंटल प्रति हैक्टेयर घास प्राप्त की जा सकती है।
  • सिंचाई के पानी का सही इस्तेमाल
  • मरुस्थलीकरण को रोकने में सिंचाई की महत्त्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ लगाने तथा उनके विकास में सिंचाई बड़ी उपयोगी साबित होती है।
  • अत्यधिक रेतीले टीले वाले इलाकों में फसल और पेड-पौधे तथा वनस्पतियाँ उगाने में सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर प्रणाली का कारगर इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • इससे जहाँ पानी की बचत हुई है वहीं राजस्थान के धूर पश्चिमी इलाकों में लेस्यूरस सिंडिकस घास की पैदावार भी काफी बढ़ गई है।
  • मगर पानी के बहुत ज्यादा इस्तेमाल से भूमिगत जल-स्तर में वृद्धि होती है और फसलों का उत्पादन घट जाता है।
  • खनन गतिविधियों में नियन्त्रण
  • इस समय बंद हो चुकी खानें या तो बंजर पड़ी हैं या उन पर बहुत कम वनस्पतियाँ (5 से 8 प्रतिशत) हैं। इन्हें फिर से हरा-भरा करने की जरूरत है।
  • शुष्क जलवायु में होने वाले पेड़-पौधों और वनस्पतियों की कुछ प्रजातियाँ जैसे प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा, अकेसिया टार्टिलिस, कोलोफास्पर्नम और डिस्क्रोस्टैचिस इन स्थानों में काफी अच्छी तरह उग सकती हैं।
  • इन्हें बंद हो चुकी खानों की बंजर भूमि को हरा-भरा करने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।

वनोन्मूलन

  • वन प्रदेश का वन-रहित क्षेत्रों में रूपांतरण करना वनोन्मूलन (डीफोरेस्ट्रेशन) कहा जाता है।
  • एक आकलन के अनुसार शीतोष्ण क्षेत्र में केवल एक प्रतिशत वन नष्ट हुए हैं, जबकि उष्णकटिबंध में लगभग 40 प्रतिशत वन नष्ट हो गए हैं। भारत में खासकर निर्वनीकरण की वर्तमान स्थिति काफी दयनीय है।
  • 20वीं सदी के प्रारंभ में भारत के कुल क्षेत्रफल के लगभग 30 प्रतिशत भाग में जंगल थे। सदी के अंत तक यह घटकर 21.54 प्रतिशत रह गया।
  • यूएनईपी और खाद्य एवं कृषि संगठन की 2020 की एक रिपोर्ट में पाया गया कि, पिछले 30 वर्षों में, अन्य भूमि उपयोगों (जो भारत के आकार से बड़ा है) में रूपांतरण के कारण 420 मिलियन हैक्टेयर जंगल नष्ट हो गए हैं, और अन्य 100 मिलियन हेक्टेयर खतरे में हैं।
  • रिपोर्ट में कहा गया है, “वनों की कटाई और वनों का क्षरण खतरनाक दर पर जारी है, जो जैव विविधता के चल रहे नुकसान में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।” इसने चेतावनी दी कि सतत विकास लक्ष्यों को 2030 तक पूरा नहीं किया जाएगा जब तक कि कृषि वानिकी, कृषि व्यवसाय और कृषि क्षेत्रों में नाटकीय परिवर्तन नहीं होते।
  • पर्यावरण की दृष्टि से वन, पेड़-पौधे और वनस्पति से आच्छादित वे क्षेत्र हैं जो वायुमंडल की कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से वापस ऑक्सीजन देकर वायुमंडल को संतुलित रखते हैं।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार मानव विकास के पूर्व ही वनों का विकास हो गया था प्रारंभिक अवस्था में पृथ्वी का लगभग 25 प्रतिशत भाग इन वनों से ढँका था, पृथ्वी पर वन संसाधन भू-पारिस्थितिकी के सबसे प्रमुख उदाहरण हैं। मानव ने इन वन संसाधनों का उपयोग कई रूपों में किया है तथा इसके साथ सामंजस्य भी कई रूपों में स्थापित किया है। इसी कारण वन मानव के पालन गृह रहे हैं।
  • वनों का प्रयोग केवल लकड़ी का ईंधन या कच्चे माल के रूप में प्रयोग करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके अनेक पर्यावरणीय एवं भौगोलिक महत्त्व हैं।
  • ये ऑक्सीजन (प्राण वायु) के संचित कोप स्थल हैं। जो कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन देते हैं। अप्रत्यक्ष रूप से विश्वतापन रोकने में इनकी महती भूमिका हैं।
  • वन आच्छादित क्षेत्र वायुमंडल की आर्द्रता बनाए रखते हैं जिससे अधिक वर्षा की संभावना रहती है।
  • ये नदियों के प्रवाह को नियमित करते हैं, उनके प्रदूषण को नियंत्रित करते हैं, मिट्टी को बहकर जाने से रोकते हैं, बाढ़ रोकते हैं या कम करते हैं।
  • वन, पानी और मिट्टी जैसे महत्त्वपूर्ण संसाधनों की सुरक्षा और संरक्षण (conservation) करते हैं तथा भूमि क्षरण रोकते हैं। भू-सतही जल को रोककर और उसे स्वच्छ कर भूमिगत जल के रूप में संगृहित करते हैं तथा जमीन की नमी को बनाए रखते हैं।
  • अनेक पशु-पक्षी और जीव-जंतुओं का ये आश्रय-स्थल होते हैं। शेर जैसे वन्य जीव को आश्रय देकर पर्यावरण संतुलन की भूमिका निर्वाह करने में सहायक बनते हैं।
  • वनों से औषधियाँ प्राप्त होती हैं। जिससे अनेक अस्वस्थ लोगों का उपचार संभव है।
  • जल-चक्र तथा वायु-चक्र में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
  • मनोरंजन स्थल के रूप में विकसित कर इन्हें आय का साधन बनाया जा सकता है।
  • गोंद, लाख, कत्था, शहद, रबड़, मोम और न जाने कितने प्रकार की गौण उपज वनों से प्राप्त होती है।
  • कई प्रकार के कुटीर उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं, जैसे-बेंत का फर्नीचर, खिलौने आदि।
  • वन भूमि की उर्वरकता को बढ़ाते हैं। वृक्षों से भूमि पर गिरने वाली पत्तियाँ आदि सड़-गल मिट्टी में मिल जाती है। इससे मिट्टी को जीवाश्म प्राप्ति होती है।
  • वन उद्योगों से होने वाले प्रदूषण को रोकते हैं। घनी वृक्षावली कई प्रकार की विषैली गैसों का अवशोषण करती है। वृक्ष ध्वनि प्रदूषण को भी कम करते हैं।
  • वन किसी भी राष्ट्र की जीवन रेखा (Life Line) हैं, क्योंकि राष्ट्र विशेष के समाज की समृद्धि तथा कल्याण उस देश के स्वास्थ्य एवं समृद्ध वन संपदा पर प्रत्यक्ष रूप से आधारित होता है। वन प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के जैविक संघटकों में से एक महत्त्वपूर्ण संघटक है तथा पर्यावरण की स्थिरता और पारिस्थितिकीय संतुलन उस क्षेत्र की वन संपदा की दशा पर आधारित होता है।

वनोन्मूलन या वन विनाश (Deforestation)

वर्तमान प्राकृतिक वनस्पतियों के लिए पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं यथा-मृदा अपरदन में वृद्धि, बाढ़ों की आवृत्ति तथा विस्तार में वृद्धि, वर्षा में कमी के कारण सूखे की घटनाओं में वृद्धि, जंतुओं की कई जातियों का विलोपन आदि। पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से प्रत्येक देश के समस्त भौगोलिक क्षेत्रफल के कम से कम एक-तिहाई भाग पर घना वनावरण होना चाहिए परंतु इस पारिस्थितिकीय नियम का प्रत्येक देश में उल्लंघन किया गया है।

वनोन्मूलन या वन विनाश के कारण –

वन विनाश के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  • औद्योगीकरण
  • आर्थिक विकास हेतु तेजी से औद्योगिकीकरण हो रहा है। उद्योगों को स्थापित करने हेतु वन काटकर जमीन उपलब्ध कराई गई है।
  • इन उद्योगों में कच्चा माल एवं ईंधन हेतु प्रति वर्ष लाखों हैक्टेयर वन काटे जा रहे हैं। खनन के कारण भी जंगल काटे जाते हैं। इसी प्रकार पैकिंग उद्योग भी वनों को क्षति पहुँचाता है।
  • झूम खेती
  • वनोन्मूलन का एक कारण झूम खेती भी रहा है। इसके कारण विश्व में उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों का तेजी से विनाश हो रहा है, झूम खेती में किसी क्षेत्र विशेष की समस्त वनस्पति जला दी जाती है। जो राख शेष बचती है।
  • वह भूमि की उर्वरता में मिलकर उसकी उर्वरता को बढ़ा देती है, इस भूमि पर वर्ष में दो-तीन फसलें बोई जा सकती है।
  • .
  • जब इस भूमि की उर्वरता कम होने लगती है तो कृषक इस भूमि को छोड़कर नई भूमि पर इस प्रकार की फसल प्राप्त करते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में झूम खेती अधिक प्रचलित है।
  • अतिचारण
  • विकासशील देशों में दुधारू पशुओं की संख्या तो बहुत अधिक है परंतु उनकी उत्पादकता निहायत कम है, ये अनर्थिक पशु विरल तथा खुले वनों में भूमि पर उगने वाली झाड़ियों, घासों तथा शाकीय पौधों को चट कर जाते हैं, साथ ही ये अपनी खुरों से भूमि को रौंद देते हैं जिससे उगते पौधे नष्ट हो जाते हैं तथा नए बीजों का अंकुरण तथा छोटे पौधों का प्रस्फुटन नहीं हो पाता है।
  • बनों का चारागाहों में परिवर्तन
  • विश्व के सागरीय जलवायु वाले क्षेत्रों में शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों खासकर उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रीका में डेयरी फार्मिंग के विस्तार एवं विकास के लिए वनों को व्यापक स्तर पर पशुओं के लिए चारागाहों में बदला गया है।
  • उपजाऊ भूमि की कमी
  • वनों के अभाव में बाढ़ नियंत्रण नहीं हो पाता है जिससे फसल एवं जानमाल की बर्बादी होती है, साथ ही साथ देश की उपजाऊ मिट्टी समुद्र में चली जाती है। फलतः भूमि की उत्पादकता कम हो जाती है और उपजाऊ भूमि की कमी हो जाती है।
  • वन भूमि का कृषि भूमि में परिवर्तन
  • मुख्य रूप से विकासशील देशों में मानव जनसंख्या में तेजी से हो रही वृद्धि के कारण यह आवश्यक हो गया है कि वनों के विस्तृत क्षेत्रों को साफ करके उस पर कृषि की जाए, ताकि बढ़ती जनसंख्या का पेट भर सके।
  • उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधों में स्थित कई विकासशील देशों में जनसंख्या में अपार वृद्धि होने के कारण कृषि क्षेत्रों में विस्तार करने के लिए उनके वन क्षेत्रों के एक बड़े भाग का सफाया किया जा चुका है।
  • वनाग्नि
  • प्राकृतिक कारणों से या मानव जनित कारणों से वनों में आग लगने से वनों का तीव्र गति तथा लघुतम समय में विनाश होता है। वनाग्नि के प्राकृतिक स्रोतों में वायुमंडलीय बिजली सर्वाधिक प्रमुख है।
  • निर्धनता
  • वनोन्मूलन का एक कारण देश में निर्धनता की अधिकता भी है। भारतवर्ष जैसे विकासशील देशों में जनसंख्या का एक बड़ा भाग निर्धनता का जीवन व्यतीत कर रहा है। इनकी आजीविका का प्रमुख स्रोत वन से प्राप्त होने वाली लकड़ी एवं गौण उपजें हैं। अतः जनसंख्या के बढ़ने के साथ यदि गरीबी बढ़ती है तो वनोन्मूलन भी बढ़ता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में श्रीमती इंदिरा गाँधी ने कहा था, “गरीबी सबसे अधिक प्रदूषण फैलाती है।”
  • बहु-उद्देशीय नदी-घाटी परियोजना
  • इन योजनाओं के कार्यान्वयन के समय विस्तृत वन-क्षेत्र का क्षय होता है क्योंकि बाँधों के पीछे निर्मित वृहद् जल भंडारों में जल के संग्रह होने पर वनों से आच्छादित विस्तृत भू-भाग जलमग्न हो जाता है।
  • वनोन्मूलन के प्रतिकूल प्रभाव –
  • पर्यावरण का दुष्प्रभाव
  • प्राकृतिक संतुलन में वनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अतः वन विनाश का पर्यावरण पर प्रत्यक्ष रूप में बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उपजाऊ भूमि का कटाव, बाढ़, सूखा, कम वर्षा, पर्यावरण प्रदूषण इत्यादि वन विनाश के भी परिणाम हैं।
  • पानी की कमी
  • वन पास की जलवायु को नर्म बनाकर बादलों को आकर्षित करते हैं जिससे वर्षा होती है। वन विनाश के कारण पानी की उपलब्धता कम हो गई है। वनों की कटाई से जन-संतुलन बिगड़ जाता है। यही नहीं, वनों के खत्म होने से तालाब और कुएँ भी सूख जाते हैं। और वर्ष भर बहने वाले स्रोत भी बरसाती होकर रह जाते हैं।
  • मिट्टी का कटाव
  • वनों की अनुपस्थिति में वर्षा का जल बिना किसी अवरोध के सीधे भूमि पर गिरता है। जिससे मिट्टी पर तीव्र आघात होता है और मिट्टी की क्षति होती है। जबकि वनों में वृक्षों की जड़ें मिट्टी के नीचे तक जाकर मिट्टी को जकड़े रहती हैं जिससे वर्षा के कारण मिट्टी का कटाव नहीं होता और भूमि की उत्पादकता बनी रहती है परंतु वनों के विनाश के कारण मिट्टी का कटाव सुगमता से और अधिक मात्रा में होती है।
  • भूस्खलन
  • वनों की अत्यधिक कटाई से भूस्खलन में वृद्धि हो जाती है। भूस्खलन में जन एवं संपत्ति की अपार क्षति होती है।
  • वन विनाश या वनोन्मूलन को रोकने के उपाय –

  • वनोन्मूलन को रोकने के लिए निम्नलिखित उपायों को किया जाना चाहिए-
  • COP26 संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में 100 से अधिक विश्व नेताओं ने 2030 तक वनों की कटाई को समाप्त करने और उलटने का वादा किया है जिसमें लगभग $19.2 बिलियन सार्वजनिक और निजी निधि भी शामिल है। यह प्रकृति के संरक्षण के लिए उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम है।
  • वन प्रबंधन -वनोन्मूलन को रोकने के लिए समुचित वन प्रबंधन नीति अपनाई जानी चाहिए। इसके अंतर्गतः
  • वनों के पेड़ों की कटाई विवेकपूर्ण एवं वैज्ञानिक ढंग से की जानी चाहिए।
  • वनों पर विनाशकारी प्रभाव डालने वाले पर्यावरणीय घटकों, जैसे-भूमि, वन, पौधों में रोग आदि से वनों की रक्षा हेतु कार्यक्रम के विशेष प्रयास किए जाने चाहिए।
  • वृक्षारोपण अधिक किया जाना चाहिए। किसी स्थान में विशेष आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुसार ही वृक्षारोपण किया जाना चाहिए।
  • प्राकृतिक वन पौधों के स्थान पर बागान नहीं लगाने चाहिए। हिमालय के कई क्षेत्रों विशेषकर हिमाचल प्रदेश में वनों को काटकर सेब की खेती के कारण स्थानीय पर्यावरण को नुकसान पहुँचा है।
  • वन संरक्षण
  • वन विनाश को नियंत्रित करने के लिए वन प्रबंधन के साथ-साथ वन संरक्षण की भी आवश्यकता है। इस हेतु सरकार को वन क्षेत्रों को अपने अधीन लेकर वनों की कटाई पर पूर्ण नियंत्रण लगा देना चाहिए। जैसा कि भारत में वन सुरक्षा के अंतर्गत सरकार ने संवेदनशील जंगली पेड़ों की कटाई पर पूर्णतः रोक लगा दी है।
  • ‘REDD+
  • विश्व के वनों की रक्षा करना जलवायु के लिए महत्त्वपूर्ण है। वन भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और नष्ट या क्षतिग्रस्त होने पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का स्रोत हो सकते हैं। देशों ने पेरिस समझौते के हिस्से के रूप में वनों की रक्षा के लिए ‘REDD+’ ढाँचे की स्थापना की।
  • ‘आरईडीडी’ का अर्थ ‘विकासशील देशों में वनों की कटाई और वन क्षरण से उत्सर्जन को कम करना’ है। ‘+’ अतिरिक्त वन-संबंधी गतिविधियों के लिए है जो जलवायु की रक्षा करती हैं, अर्थात् वनों का स्थायी प्रबंधन और वन कार्बन स्टॉक का संरक्षण और वृद्धि। इन REDD+ गतिविधियों के ढाँचे के तहत, विकासशील देश वनों की कटाई को कम करने पर उत्सर्जन में कटौती के लिए परिणाम-आधारित भुगतान प्राप्त कर सकते हैं। यह उनके प्रयासों के लिए एक प्रमुख प्रोत्साहन के रूप में कार्य करता है।
  • वन संरक्षण में लोगों की भागीदारी को बढ़ाना सामाजिक वानिकी (Social Forestry) को प्रोत्साहित करना
  • सामाजिक वानिकी से अभिप्राय वन विकास की उस प्रणाली से है जिसके द्वारा समुदाय की आर्थिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर वृक्षारोपण तथा ईंधन की लकड़ी प्राप्त करने के लिए वृक्ष कटाव के कार्यक्रम तैयार किए जाते हैं।
  • इसके अंतर्गत बंजर भूमि, ग्राम समाज की परती भूमि, नहरों, सड़कों एवं रेल लाइनों के दोनों ओर की खाली पड़ी भूमि, विकृत वन खंडों में वृक्षारोपण किया जाता है।
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