राजस्थान के इतिहास की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ, प्रमुख पुरातात्विक स्थल, कालीबंगा, आहड़, बागोर, गणेश्वर, बैराठ, नगरी, महाजनपद कालीन राजस्थान तथा महत्वपूर्ण तथ्य विस्तार से पढ़ें।

राजस्थान के इतिहास की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ | प्रमुख पुरातात्विक स्थल एवं महाजनपद

1. कालीबंगा

  • यह एक कांस्ययुगीन सभ्यता है।
  • कालक्रम – 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. (कार्बन डेटिंग पद्धति के अनुसार)
  • यह पुरास्थल हनुमानगढ़ जिले में प्राचीन सरस्वती/दृषद्वती नदी (वर्तमान में घग्घर) के बाएँ तट पर स्थित है।
  • खोज – वर्ष 1952 में अमलानंद घोष द्वारा।
  • उत्खनन – वर्ष 1961-1964 के मध्य बी. बी. लाल, बी.के. थापर, जे.वी. जोशी, एम.डी. खरे, के.एम. श्रीवास्तव तथा एस.जी. जैन द्वारा।
  • यहाँ उत्खनन के लिए दो टीलों को चुना गया, जो समतल भूमि से 12 मीटर की ऊँचाई पर थे। ये दोनों टीले सुरक्षात्मक दीवार से घिरे हुए थे।
  • उत्खनन से प्राप्त काले रंग की चूड़ियों के कारण कालीबंगा नामकरण हुआ।
  • यह नगरीय सभ्यता थी।
  • इसका 5 स्तरों तक उत्खनन किया गया।
  • प्रथम दो स्तर तो हड़प्पा सभ्यता से भी प्राचीन हैं, वहीं तीसरा, चौथा व पाँचवाँ स्तर हड़प्पा सभ्यता के समकालीन है।
  • इस आधार पर इसे दो भागों में बाँटा गया है –
    (1) प्राक् हड़प्पा सभ्यता
    (2) हड़प्पा सभ्यता

प्राक् हड़प्पा या पूर्व हड़प्पा कालीन चरण

  • हड़प्पा व मोहनजोदड़ो के दुर्गों की तरह यहाँ पर भी दुर्ग पश्चिम में तथा आवास क्षेत्र पूर्व में स्थित हैं।
  • रक्षा प्राचीरों से दुर्ग व निचले नगर के घिरे होने का स्पष्ट साक्ष्य मिला है।

नगर निर्माण – समचतुर्भुजाकार मिट्टी की “रक्षा प्राचीर” के अंदर आवासों का निर्माण।

  • “सूर्यतपी ईंटों” से दीवारें बनती थी और इन्हें मिट्टी से जोड़ा जाता था।
  • मार्ग की चौड़ाई 5-5.5 मीटर।
  • नगर की सड़कें पक्की थी।

आवास – कच्ची ईंटों (30×15×7.5 सेमी.) से निर्मित।

  • मकानों में दालान, चार-पाँच बड़े कमरे व कुछ छोटे कमरे और मकानों के आगे चबूतरे भी रहते थे।
  • कमरों की फर्श को चिकनी मिट्टी से लीप दिया जाता था। कहीं-कहीं पकाई गई ईंटों के फर्श भी दिखाई देते हैं।
  • मकानों की छत मिट्टी से निर्मित होती थीं, जिनको लकड़ी की बल्लियों से बनाया जाता था।
  • मकानों की नालियाँ, शौचालय, भट्टियों व कुओं में पकी हुई ईंटों का प्रयोग किया गया।
  • कालीबंगा का एक फर्श, हड़प्पाकाल का एकमात्र ऐसा उदाहरण है जहाँ अलंकृत ईंटों का प्रयोग हुआ है।

जल निकास प्रणाली – लकड़ी की नालियों के अवशेष प्राप्त।

  • गंदे पानी को निकालने के लिए विशेष प्रकार के गोलाकार भांड होते थे।

मृद्भांड – विशेष प्रकार के पात्र राजस्थान में सर्वप्रथम सौंथी से प्राप्त हुए हैं, इसलिए इन्हें “सौंथी मृद्भांड परंपरा” नाम दिया गया।

  • यहाँ से प्राप्त हड़प्पाकालीन मृद्भांडों को 6 उपभागों में विभाजित किया गया है। इनमें विभिन्न प्रकार के घड़े, तश्तरियाँ, लघु पात्र एवं कटोरे प्रमुख हैं।
  • यहाँ से प्राप्त मिट्टी के बर्तन एवं उनके अवशेष पतले एवं हल्के हैं तथा उनमें सुन्दरता व सुडौलता का अभाव है।

कृषि – जुते हुए खेतों के अवशेष प्राप्त। संस्कृत साहित्य में उल्लिखित “बहुधान्यदायक क्षेत्र” यही था।

  • घग्घर नदी के बाएँ किनारे पर स्थित खेत तीसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व के हैं, संसार भर में उत्खनन से प्राप्त खेतों में यह पहला है।
  • खेत में ग्रिड पैटर्न की गर्तधारियों के निशान हैं जो एक-दूसरे के समकोण पर बने हुए हैं।
  • दो तरह की फसलों (चना व सरसों) को एक साथ उगाया जाता था।

विकसित हड़प्पा या हड़प्पाकालीन चरण

  • विशिष्ट लोगों के निवास हेतु मुख्य प्रासाद तथा साधारण जनता के लिए निम्न प्रासाद का निर्माण जो एक-दूसरे से 40 मीटर चौड़े मार्ग द्वारा विभाजित हैं।
  • सात अग्निवेदिकाएँ प्राप्त हुईं, जो आयताकार हैं।
  • डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को “सैंधव सभ्यता की तीसरी राजधानी” कहा है।

लिपि – सैंधव लिपि। इसे पढ़ा नहीं जा सका है। यह लिपि दायीं से बायीं ओर लिखी जाती थी।

मुहरें – यहाँ मिट्टी से बनी सर्वाधिक मुद्राएँ अथवा मुहरें मिली हैं।

  • यहाँ से प्राप्त बेलनाकार मुहरें मेसोपोटामिया की मुहरों जैसी हैं।

मूर्तिकला – वृषभाकृति, मिट्टी से बना कुत्ता, भेड़िया, चूहा और हाथी की प्रतिमाएँ मिली हैं।

अंत्येष्टि क्रिया एवं चिकित्सा

  • अंत्येष्टि संस्कार की तीनों विधियाँ – पूर्ण समाधीकरण, आंशिक समाधीकरण एवं दाह संस्कार के साक्ष्य मिले हैं।
  • एक युगल शवाधान तथा अंडाकार कब्रें भी प्राप्त हुई हैं।
  • एक बच्चे के कंकाल की खोपड़ी में 6 छिद्र मिले हैं, जिसे मस्तिष्क रोग के इलाज का प्रमाण माना जाता है। यह शल्य क्रिया का प्राचीनतम उदाहरण है।
  • 2600 ईसा पूर्व भूकंप की जानकारी उत्खनन से प्राप्त हुई, जो “भूकंप का प्राचीनतम साक्ष्य” है।
  • संभवतः घग्घर नदी के सूखने से कालीबंगा का विनाश हुआ।
  • कालीबंगा को “दीन-हीन बस्ती” भी कहा जाता है।

2. बागोर

  • यह मध्य पाषाणकालीन सभ्यता स्थल है।
  • स्थित – भीलवाड़ा की मांडल तहसील में कोठारी नदी के तट पर।
  • बागोर में प्रागैतिहासिक काल की सभ्यता के अवशेष मिले हैं, जो 4000-5000 ई. पूर्व के माने जाते हैं।
  • उत्खनन – वर्ष 1967-70 में डॉ. वीरेन्द्रनाथ मिश्र, डॉ. एल.एस. लेष्निक व डेक्कन कॉलेज पूना तथा राजस्थान पुरातत्व विभाग के सहयोग से किया गया।
  • इस सभ्यता को ‘आदिम संस्कृति का संग्रालय’ माना जाता है।
  • यहाँ से 14 प्रकार की कृषि किए जाने के अवशेष मिले हैं।
  • उत्खनन से पाँच ताँबे के उपकरण प्राप्त हुए हैं, जिनमें से एक 10.5 सेमी. छेद वाली सुई सबसे महत्वपूर्ण है।
  • यहाँ कृषि एवं पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
  • मकान पत्थर से बने थे तथा फर्श में भी पत्थरों को समतल कर जमाया जाता था।
  • यहाँ से प्राप्त पाषाण उपकरणों में ब्लेड, छिद्रक, स्क्रेपर तथा चांद्रिक आदि प्रमुख हैं।
  • यह स्थल लघुपाषाण उपकरणों का प्रमुख केंद्र था।

3. गणेश्वर

  • गणेश्वर सभ्यता सीकर जिले में कांटली नदी के किनारे पर स्थित है।
  • गणेश्वर प्राक् हड़प्पा कालीन सभ्यता स्थल है।
  • ताम्रयुगीन सभ्यताओं में प्राप्त तिथियों में गणेश्वर प्राचीनतम सभ्यता स्थल है।

समय – 2800 ईसा पूर्व (डी. पी. अग्रवाल ने रेडियो कार्बन विधि एवं तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर निर्धारित की)

उपनाम

  1. पुरातत्व का पुष्कर
  2. भारत में ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी
  3. ताम्रवंती संस्कृति

उत्खनन

  1. रतनचंद अग्रवाल द्वारा वर्ष 1977 में
  2. वर्ष 1978-79 में विजय कुमार द्वारा
  • लगभग 2000 ताम्र आयुध व ताम्र उपकरण प्राप्त।
  • इन उपकरणों में तीर, भाले, सुइयाँ, कुल्हाड़ी, मछली पकड़ने के काँटे, चूड़ियाँ व विविध ताम्र आभूषण प्रमुख हैं।
  • गणेश्वर के उत्खनन से प्राप्त ताँबे के उपकरण व पात्रों में 99 प्रतिशत ताँबा है, जो यहाँ प्रचुर मात्रा में ताँबा प्राप्त होने का प्रमाण है।
  • गणेश्वर से ताँबा हड़प्पा व मोहनजोदड़ो को भेजा जाता था।

महत्वपूर्ण मृद्भांड

  • गणेश्वर से प्राप्त मृद्भांड।
  • काले व नीले रंग से अलंकृत मृद्भांड भी मिले हैं।
  • मकानों के लिए पत्थर का प्रयोग करने के साक्ष्य मिले हैं।
  • बस्ती को बाढ़ से बचाने के लिए पत्थर के बाँध भी बनाए गए थे।
  • उत्खनन से दोहरी पत्थर घिरे वाली तापभट्टी भी प्राप्त हुई है।

4. आहड़

  • यह पुरास्थल उदयपुर जिले में आयड़/बेड़च नदी के किनारे स्थित है।
  • इसका समय लगभग 4 हजार वर्ष प्राचीन माना जाता है।
  • डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने आहड़ सभ्यता का समयकाल 1900 ई. पू. से 1200 ई.पू. तक माना है।

उपनाम

  1. आयड़पुर या आयड़ दुर्ग (दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में)
  2. ताम्रवती नगरी (ताँबे के औजारों व उपकरणों के अत्यधिक प्रयोग के कारण)
  3. बनास घाटी सभ्यता
  4. धूलकोट

उत्खनन

  1. सर्वप्रथम वर्ष 1953 में अक्षयकीर्ति व्यास द्वारा
  2. वर्ष 1956 में आर. सी. अग्रवाल द्वारा
  3. वर्ष 1961-62 में एच. डी. सांकलिया एवं वी. एन. मिश्र द्वारा
  • डॉ. सांकलिया ने इसे ‘ताम्रकाल’ की संज्ञा दी है।
  • यहाँ पर उत्खनन से बस्तियों के 8 स्तर मिले।
  • यह एक ग्रामीण सभ्यता थी।

आवास

  • मकान पत्थरों की नींव डालकर जबकि दीवारें मिट्टी से बनी ईंटों की होती थीं।
  • छतों पर बाँस बिछाकर मिट्टी का लेप किया जाता था।
  • मकानों से गंदा पानी निकालने की नालियों का भी प्रमाण मिला है।
  • एक मकान में 4 से 6 बड़े चूल्हों का होना संयुक्त परिवार की व्यवस्था का प्रमाण है।

मृद्भांड

  • लाल, भूरी व काली मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग।
  • घरेलू बर्तन – घड़े, कटोरियाँ, रकाबियाँ, प्याले, मटके, कुंडे, भंडार के कलश आदि प्राप्त हुए हैं।
  • उत्खनन में सर्वाधिक मात्रा में मिट्टी के बर्तन मिलना, इसे लाल-काले मिट्टी के बर्तनों वाली संस्कृति का प्रमुख केंद्र साबित करते हैं।
  • पशुपालन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था और लोग कृषि से परिचित थे।
  • “गोरे” या “कोठे” – अनाज रखने के मृद्भांडों का स्थानीय नाम।

मुद्राएँ एवं मुहरें

  • तृतीय ईसा पूर्व से प्रथम ईसा पूर्व की चुनायी ताँबे की 6 मुद्राएँ व 3 मुहरें प्राप्त।
  • एक मुद्रा पर एक ओर त्रिशूल तथा दूसरी ओर अपोलो देवता अंकित हैं, जो तीर एवं तरकश से युक्त हैं।

उद्योग

  • पत्थरों की उपलब्धता से अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ पत्थरों से शस्त्र बनाने का बड़ा केंद्र रहा होगा।
  • मध्य पाषाण कालीन उपकरण के रूप में ‘रामस्क्रेपर्स व स्फटिक’ उपकरण प्राप्त।

प्रमुख व्यवसाय

  • ताँबा गलाना तथा उससे उपकरण बनाना।
  • उत्खनन से प्राप्त तर्पों से रंगाई-छपाई व्यवसाय के उन्नत होने का अनुमान।
  • तौल के बाट व माप प्राप्त।
  • ताँबे की 6 कुल्हाड़ियाँ, अंगूठियाँ, चूड़ियाँ मिली हैं।
  • मूल्यवान पत्थरों; जैसे- गोमेद, स्फटिक आदि का प्रयोग आभूषण तथा ताबीज के रूप में किया जाता था।
  • आहड़वासी मृतकों को गहनों व आभूषणों के साथ दफनाते थे, जो इनके मृत्यु के बाद भी जीवन की अवधारणा का समर्थक होने का प्रमाण है।
  • खुदाई में पूजा-पात्र भी प्राप्त हुए हैं।
  • टेराकोटा वृषभ आकृतियाँ मिली, जिन्हें ‘बनासियन बुल’ कहा गया है।
  • आहड़ से नारी की खंडित मूर्ति मिली है, जो कमर के नीचे लहंगा धारण किए हुए है।
  • गिलुंड (राजसमंद) से आहड़ के समान धर्म-संस्कृति मिली है।
  • आहड़ सभ्यता के लोग मिट्टी के बर्तन पकाने की उल्टी तपाई विधि से परिचित थे।

5. गिलुंड

  • ताम्रयुगीन सभ्यता।
  • स्थित – राजसमंद जिले में बनास नदी के तट पर।
  • इसे ‘बनास संस्कृति’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • ‘मॉर्यल प्रांगण’ नामक टीले का संबंध गिलुंड सभ्यता से है।
  • उत्खनन – वर्ष 1957-58 में बी. बी. लाल द्वारा।
  • वर्ष 1998 से वर्ष 2003 के मध्य पूना के डॉ. वी. एस. शिंदे, पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय अमेरिका के प्रो. ग्रेगरी पोशल के निर्देशन में गिलुंड में उत्खनन किया गया।
  • इसका समय 1900-1700 ई.पू. निर्धारित किया गया है।
  • यहाँ सांस्कृतिक स्तर पर लगभग एक हजार वर्ष ईसा पूर्व के स्लेटी रंग की तश्तरियाँ एवं कटोरें प्राप्त हुए हैं।
  • आहड़ की भाँति यहाँ कच्ची ईंटों (कच्ची ईंटों) का उपयोग नहीं हुआ, जबकि गिलुंड में पक्की ईंटों का प्रयोग प्रमुखता में होता था।
  • उत्खनन से ताम्रयुगीन सभ्यता एवं बाद की सभ्यताओं के अवशेष मिले।
  • यहाँ पर हाथी दाँत की चूड़ियों के अवशेष मिले हैं।

6. रंगमहल

  • स्थित – गंगानगर जिले में घग्घर नदी के पास है।
  • यह एक ताम्रयुगीन सभ्यता है।
  • उत्खनन – डॉ. हन्नारिड के निर्देशन में स्वीडिश दल द्वारा वर्ष 1952-54 में किया गया।
  • कुषाणकालीन तथा उससे पहले की 105 ताँबे की मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं, जिनमें कुछ पंचमार्क मुद्राएँ भी हैं।
  • ब्राह्मी लिपि में नाम अंकित वस्त्रों की सीलें भी प्राप्त हुई हैं।
  • यहाँ के निवासी मुख्य रूप से चावल की खेती करते थे।
  • मकानों का निर्माण ईंटों से होता था।
  • यहाँ से प्राप्त मृद्भांड मुख्यतः लाल या गुलाबी रंग के थे।
  • गांधार शैली की मूर्तियाँ, टोंटीदार घड़े, चपटाकार मृद्भांड एवं कनिष्क कालीन मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं।
  • गुरु-शिष्य की मिट्टी की मूर्ति प्राप्त हुई है।
  • इसे कुषाणकालीन सभ्यता के समान माना जाता है।
  • यहाँ बस्तियों के तीन बार बसने एवं उजड़ने के प्रमाण मिले हैं।

7. तिलवाड़ा

  • स्थित – बालोतरा जिले में लूणी नदी के किनारे।
  • उत्खनन – वर्ष 1966-67 में ‘राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग’ द्वारा करवाया गया।
  • उत्खनन कार्य का नेतृत्व – डॉ. वी. एन. मिश्र।
  • यह एक ताम्र पाषाणकालीन स्थल है।
  • यहाँ से 500 ई.पू. से 200 ई. तक विकसित सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।
  • यहाँ एक अग्निकुंड मिला है, जिसमें मानव अस्थि भस्म तथा मृत पशुओं के अवशेष मिले हैं।

8. बालाथल

  • स्थित – उदयपुर जिले में बालाथल गाँव के पास बेड़च नदी के निकट।
  • यहाँ से ताम्र-पाषाणकालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • खोज – वर्ष 1962-63 में डॉ. वी. एन. मिश्र द्वारा।
  • उत्खनन – वर्ष 1993 में डॉ. वी. एस. शिंदे, आर. के. मोहंते, डॉ. देवेन्द्र कोठारी एवं लालित पाण्डे ने।
  • 11 कमरों के विशाल भवन के अवशेष मिले हैं।
  • लोग बर्तन बनाने तथा कपड़ा बुनने के बारे में जानकारी रखते थे।
  • यहाँ से पाँचवीं सदी ईसा पूर्व का हाथ से बुना कपड़े का एक टुकड़ा प्राप्त हुआ है।
  • उत्खनन में मिट्टी से बनी साँड की आकृतियाँ मिली हैं।
  • बालाथल निवासी मांसाहारी भी थे।
  • 4000 वर्ष पुराना कंकाल मिला है, जिसको भारत में कुष्ठ रोग का सबसे पुराना प्रमाण माना जाता है।
  • योगी मुद्रा में शवाधान का प्रमाण प्राप्त हुआ है।
  • बालाथल का संबंध हड़प्पा सभ्यता से होने का पुख्ता प्रमाण प्राप्त होता है।

9. बैराठ

  • यह कोटपूतली-बहरोड़ जिले में बाणगंगा नदी के किनारे स्थित है।
  • प्राचीन नाम – विराटनगर। महाजनपद काल में यह मत्स्य जनपद की राजधानी था।
  • यह लौहयुगीन सभ्यता है।
  • यह पूर्ण आग्नेय संस्कृति आधारित सभ्यता स्थल है।
  • वर्ष 1910 में डॉ. डी. आर. भंडारकर द्वारा इस क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन व सूक्ष्म परीक्षण किया गया।

उत्खनन

  1. दयाराम साहनी द्वारा वर्ष 1936-37 में बीजक की पहाड़ी का प्रथम पुनः परीक्षण करवाया गया।
  2. वर्ष 1962-63 में नीलरत्न बनर्जी तथा कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा।
  • वर्ष 1837 में कैप्टन बर्ट ने यहाँ से मौर्य सम्राट अशोक के भाब्रू शिलालेख की खोज की, जो अशोक के बौद्ध धर्म का अनुयायी होने का सबसे ठोस प्रमाण माना जाता है। वर्तमान में यह शिलालेख कोलकाता संग्रहालय में सुरक्षित है।
  • भाब्रू शिलालेख के नीचे बुद्ध, धम्म एवं संघ लिखा हुआ है।
  • बैराठ में बीजक की पहाड़ी, भीमजी की डूंगरी, महादेवजी की झोंपरी तथा गणेश जी माता ईसरी से उत्खनन कार्य किया गया।
  • प्रागैतिहासिक कालीन गुफा चित्र व शैलचित्रों के प्रमाण।
  • बैराठ को “प्राचीन युग की विशाला” भी कहा गया है।

महाभारत कालीन अवशेष

  • महाभारत के अनुसार पांडवों ने यहाँ अपना अज्ञातवास व्यतीत किया।
  • “भीमलाट” की डूंगरी में एक गुफा है जिसमें पानी भरा रहता है, इसे “भीमलाट कुंड” कहते हैं।
  • महाभारत कालीन ईश्वरावास मंदिर के अवशेष मिले।

मौर्यकालीन अवशेष

  • वर्ष 1999 में बीजक की पहाड़ी से अशोक कालीन गोल बौद्ध मंदिर, स्तूप एवं बौद्ध मठ के अवशेष मिले हैं।

मृद्भांड

  • अलंकृत मृद्भांड, चिह्नित पर चित्रित व स्वास्तिक का चिन्ह, खिलौने, चिड़ियों की आकृतियाँ, मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं।

मुद्राएँ

  • यहाँ से 36 मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं जिनमें 8 पंचमार्क मुद्राएँ तथा 28 इंडो-ग्रीक तथा यूनानी शासकों की हैं। इनमें से 16 मुद्राएँ यूनानी शासक मिनाण्डर की हैं।
  • अशोक कालीन ब्राह्मी लिपि की अक्षरयुक्त ईंट प्राप्त हुई है।
  • ‘शंख लिपि’ के प्रचुर संख्या में प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
  • बैराठ में पाषाणकालीन हथियारों के निर्माण का एक बड़ा कारखाना स्थित था।
  • यहाँ पर शुंग एवं कुषाण कालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • बैराठ सभ्यता के लोग ताँबे से परिचित थे। यहाँ उत्खनन से लोहे के तीर तथा भाले प्राप्त हुए हैं।
  • 634 ई. में ह्वेनसांग विराटनगर आया था तथा उसने यहाँ बौद्ध मठों की संख्या 8 बताई है।
  • ऐसा माना जाता है कि हूण आक्रांता मिहिरकुल ने बैराठ का विध्वंस कर दिया था।

मुगलकालीन अवशेष

  • मुगलकालीन टकसाल के प्रमाण मिले। यहाँ मुगल काल में ताँबे पर सिक्के ‘बैराठ’ अंकित मिलते हैं।
  • सवाई रामसिंह के समय एक स्वर्ण पेटी पाई गई, जिसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष थे।
  • डॉ. सत्यप्रकाश ने कहा है कि “आजादी के बाद जो कुछ हमने पाकिस्तान को देकर खोया है, उससे कहीं अधिक बैराठ खोकर पाया है।”

10. नगरी

  • नगरी का प्राचीन नाम – मध्यमिका
  • स्थित – चित्तौड़गढ़ में बेड़च नदी के तट पर
  • खोज – वर्ष 1872 में कार्लाइल द्वारा
  • उत्खनन – सर्वप्रथम वर्ष 1904 में डी. आर. भंडारकर तथा तत्पश्चात वर्ष 1962-63 में केंद्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा करवाया गया।
  • शिवि जनपद के सिक्के तथा गुप्तकालीन कला के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ चार प्रकार के यूप भी प्राप्त हुए हैं।
  • नगरी शिवि जनपद की राजधानी रही है।

11. रेड़

  • स्थित – टोंक जिले की निवाई तहसील में ढील नदी के किनारे
  • यह एक लौह युगीन सभ्यता है।
  • उत्खनन – वर्ष 1938-39 में दयाराम साहनी के नेतृत्व में तथा अंतिम रूप में उत्खनन कार्य डॉ. केदारनाथ पुरी के द्वारा करवाया गया।
  • इसे प्राचीन ग्रंथ ‘तांबवग्राम’ कहा जाता है।
  • यह एक धातु केंद्र था, जहाँ पर उपकरण व औजार बनाए जाते थे।
  • उत्खनन से लगभग 3075 आहत मुद्राएँ तथा 300 मालव जनपद के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
  • प्राचीन फारसी शासक एपोलोडोटस का सिक्का भी प्राप्त हुआ है।
  • यक्षिणी की प्रतिमा प्राप्त हुई है, जो शुंग काल की मानी जाती है।
  • मालव जनपद के 14 सिक्के, 6 सेनापति सिक्के एवं 7 वृक्ष के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
  • रेड़ से एशिया का अब तक का सबसे बड़ा सिक्कों का भंडार मिला है।

12. सुनारी

  • स्थित – झुंझुनूं की खेतड़ी तहसील में कांटली नदी के किनारे
  • उत्खनन – वर्ष 1980-81 में राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा।
  • लोहा गलाने की प्राचीनतम भट्टियाँ पाई गई हैं।
  • स्लॉटों से मृद्भाण्ड संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • मातृदेवी की मूर्तियाँ तथा धान संग्रह का कोठा प्राप्त हुआ है।
  • जोधपुरा, नोह तथा सुनारी से शुंग तथा कुषाणकालीन अवशेष भी प्राप्त होते हैं।
  • सुनारी के निवासी भोजन में चावल का प्रयोग करते थे।

13. जोधपुरा

  • स्थित – कोटपूतली-बहरोड़ जिले में साबी नदी के किनारे।
  • यह एक लौहयुगीन प्राचीन सभ्यता स्थल है।
  • उत्खनन – वर्ष 1972-75 में आर.सी. अग्रवाल तथा विजय कुमार के निर्देशन में सम्पन्न हुआ।
  • यह स्लॉटों तथा चित्रित मृद्भाण्ड संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थल था।
  • लोहे धातु की निक्षेपण करने वाली भट्टियाँ भी प्राप्त हुई हैं।
  • यह सभ्यता 2500 ईसा पूर्व से 200 ई. के मध्य फली-फूली।
  • यह शुंग एवं कुषाणकालीन सभ्यता स्थल है।
  • जोधपुरा एवं सुनारी (झुंझुनूं) से मौर्यकालीन सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।

14. ईसवाल

  • ईसवाल (उदयपुर) से प्रागैतिहासिक कालीन सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं।
  • लौह युगीन सभ्यता।
  • प्राचीन औद्योगिक बस्ती।
  • उत्खनन – राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर के पुरातत्व विभाग के निर्देशन में किया गया।
  • यहाँ से प्राक् ऐतिहासिक काल से मध्यकाल तक का प्रतिनिधित्व करने वाली मानव बस्ती के प्रमाण पाँच स्तरों से प्राप्त हुए हैं।
  • 5वीं शताब्दी ई.पू. में लोहे गलाने का प्राचीन होने के प्रमाण हैं।
  • यहाँ से प्राप्त सिक्कों को प्रारंभिक कुषाणकालीन माना जाता है।
  • मौर्य, शुंग, कुषाणकाल में यहाँ लोहे गलाने का कार्य होता था।
  • उत्खनन में ऊँट का दाँत एवं हड्डियाँ मिली हैं।

15. नोह

  • जिला – भरतपुर
  • उत्खनन – वर्ष 1963-64 में रतनचंद्र अग्रवाल के निर्देशन में
  • समय – 1100 ई.पू. से 900 ई.पू. (रेडियो कार्बन विधि के अनुसार)
  • विशालकाय यक्ष प्रतिमा तथा मौर्यकालीन पालिश युक्त चुनार के चिकने पत्थर के टुकड़े प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ से प्राप्त एक पात्र पर ब्राह्मी लिपि में लेख अंकित है।
  • यह एक लौहयुगीन सभ्यता है।
  • यहाँ से 5 सांस्कृतिक युगों के अवशेष मिले हैं।
  • कुषाण नरेश हुविष्क एवं वासुदेव के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
  • ताम्र युगीन, आर्य युगीन एवं महाभारत कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

16. नगर

  • नगर सभ्यता स्थल टोंक जिले में स्थित है।
  • प्राचीन नाम – ‘मालव गण’
  • उत्खनन – वर्ष 1942-43 में श्रीकृष्ण देव द्वारा किया गया।
  • यहाँ से बड़ी संख्या में मालव सिक्के तथा आहत मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं।
  • यहाँ से प्राप्त मृद्भाण्डों के अधिकतर अवशेषों का रंग लाल है।
  • उत्खनन से गुप्तकाल की स्लेटी पत्थर से निर्मित महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति प्राप्त हुई है।
  • मेढ़क रूप में गणेश का अंकन, फणाधारी नाग का अंकन, कमल धारण किए लक्ष्मी की खड़ी प्रतिमा प्राप्त हुई है।
  • उपनाम – ‘खेड़ा सभ्यता’
  • यहाँ से लगभग 6000 मालव सिक्के मिले हैं।

17. भीनमाल

  • उत्खनन – वर्ष 1953-54 में रतनचंद्र अग्रवाल के निर्देशन में
  • महाजनपद तथा शक क्षत्रपों के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ एक रोमन एम्फोरा (सुरापात्र) व एक यूनानी टोंटीदार सुराही प्राप्त हुई है, जो इसे विदेशी व्यापार का केंद्र होने की पुष्टि करता है।
  • ईसा की प्रथम शताब्दी एवं कुषाणकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी भीनमाल की यात्रा की थी।

18. बरोर

  • स्थित – श्रीगंगानगर में सरस्वती नदी के तट पर
  • उत्खनन – वर्ष 2003 में शुरू किया गया।
  • प्राप्त अवशेषों के आधार पर इसको विकसित हड़प्पा काल में बाँटा गया है।
  • वर्ष 2006 में यहाँ मिट्टी के पात्र में सेलखड़ी के लगभग 8000 मनके प्राप्त हुए हैं।
  • यह स्थल सुनियोजित नगर व्यवस्था, मकान निर्माण में कच्ची ईंटों का प्रयोग तथा विशेष मृद्भाण्ड परम्परा आदि से युक्त है।
  • बटन के आकार की मुहरें प्राप्त हुई हैं।

19. चन्द्रावती

  • जिला – सिरोही
  • प्राप्त पुरावशेष प्राचीन मानव जीवन के विविध पक्षों पर जानकारी देते हैं।
  • यह पुरामध्यकाल में एक अत्यंत महत्व का स्थल था।
  • मिट्टी के उपयोग एवं अनाज संग्रह के कोठार मिले हैं।
  • इससे ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ एक विशाल दुर्ग था।

20. नलियासर

  • जिला – जयपुर
  • समय – तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से छठी सदी तक माना जाता है।
  • यहाँ से ब्राह्मी लिपि में लिखित कुछ मुहरें प्राप्त हुई हैं।
  • आहत मुद्राएँ, उत्तर इंडोसिथियन सिक्के, कुषाण शासक हुविष्क, इंडो-ग्रीक, चौखण्डाण तथा गुप्तकालीन चाँदी के सिक्के मिले हैं।

21. लाहुरा

  • स्थित – भीलवाड़ा जिले में
  • उत्खनन – वर्ष 1998-1999 में बी. आर. मीणा के निर्देशन में
  • यहाँ से 700 ई.पू. से 200 ई. तक की सभ्यताओं के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ से मानव तथा पशुओं की मृणमूर्तियाँ, ताँबे की चूड़ियाँ, मिट्टी की मुहरें जिन पर ब्राह्मी लिपि में 4 अक्षर अंकित हैं, ललितासन में नारी की मृणमूर्तियाँ आदि प्राप्त हुई हैं।
  • शुंगकालीन ताँबे किनारे वाले प्याले प्राप्त हुए हैं।

22. ओझियाना

  • स्थित – ब्यावर के पास खारी नदी के तट पर
  • यह स्थल ताम्रयुगीन आहड़ संस्कृति से संबंधित है।
  • उत्खनन – बी. आर. मीणा तथा आलोक त्रिपाठी द्वारा वर्ष 1999-2000 में किया गया।
  • यह पुरातात्विक स्थल पहाड़ी पर स्थित था जबकि आहड़ संस्कृति से जुड़े अन्य स्थल नदी घाटियों में पनपे थे।
  • वृषभ तथा गाय की प्रथम मूर्तियाँ यहाँ से मिली हैं।
  • काल – 2500 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व तक माना जाता है।

अन्य पुरातात्विक स्थल

1. मलाह (भरतपुर)

  • स्थित – घना पक्षी अभयारण्य
  • अधिक संख्या में ताँबे की तलवारें एवं हार्पून प्राप्त हुए हैं।

2. कुराड़ा (नागौर)

  • यह ताम्रयुगीन सभ्यता स्थल है।
  • यहाँ से ताम्र उपकरण प्राप्त हुए हैं।

3. किराड़ोत (जयपुर)

  • ताम्रयुगीन 56 चूड़ियाँ प्राप्त हुई हैं।

4. मेनवा (बूंदी)

  • उत्खनन – श्रीकृष्ण देव के निर्देशन में
  • 2000 वर्ष पुरानी महिषासुरमर्दिनी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।

5. जुनाखेड़ा (पाली)

  • खोज – गैरिक
  • उत्खनन में मिट्टी के बर्तन पर “शालभंजिका” का अंकन मिला है।

6. बयाना (भरतपुर)

  • प्राचीन नाम – श्रीपथ
  • गुप्तकालीन सिक्के एवं नील की खेती के साक्ष्य मिले हैं।

7. सौंथी (बीकानेर)

  • खोज – वर्ष 1953 में अमलानंद घोष द्वारा
  • कालीबंगा प्रथम चरण के नाम से प्रसिद्ध।
  • हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं।

8. कोटड़ा (झालावाड़)

  • उत्खनन – वर्ष 2003 में दीपक शोध संस्थान द्वारा
  • 7वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

9. कणासवा/कणुसुआ (कोटा)

  • मौर्य शासक धवल का 738 ई. से संबंधित लेख मिला है।

10. टहला (अलवर)

  • पाँच से सात हजार वर्ष पुराने शैलचित्र प्राप्त हुए हैं।

11. राइढ़ (बूंदी)

  • स्थित – छाजा नदी के किनारे
  • पहली बार राइडर रॉक पेंटिंग प्राप्त हुई है।

12. बागोर (भीलवाड़ा)

  • राजस्थान की प्रथम अलंकृत गुफा मिली है।

13. गुरारा (सीकर)

  • चाँदी के लगभग 2744 पंचमार्क सिक्के मिले हैं।

14. डड़वाना (डीडवाना-कुचामन)

  • सबसे प्राचीन स्थल।

15. जायल (नागौर)

अन्य तथ्य

  • नोह एवं जोधपुरा के उत्खनन से ताँबे की सामग्री नहीं मिली है।
  • आर्य सभ्यता के समकालीन राजस्थान के पुरास्थल – सुनारी (झुंझुनूं), बैराठ (कोटपूतली-बहरोड़), अनुपगढ़ (श्रीगंगानगर), चक-64 (श्रीगंगानगर), रंगमहल (श्रीगंगानगर), नोह (भरतपुर) एवं जोधपुरा (कोटपूतली-बहरोड़) प्रमुख हैं।

महाजनपद कालीन राजस्थान

क्र.सं.जनपदवर्तमान क्षेत्रराजधानीविशेष
1मत्स्य जनपदभरतपुर, अलवर व जयपुर जिले का मध्यवर्ती भागविराटनगर या बैराठ (जयपुर)पाण्डवों ने बैराठ में अज्ञातवास बिताया था
2कुरु जनपदअलवर का उत्तरी भागइन्द्रप्रस्थ
3शिवि जनपदउदयपुर, चित्तौड़ क्षेत्र (मध्यकालीन मेवाड़ राज्य)मध्यमिका (नगरी)“मेदपाट” व “प्रागवाट” भी कहा जाता था
4मालव जनपदजयपुर-टोंक व अजमेर का कुछ क्षेत्रनगर (टोंक)
5शूरसेन जनपदभरतपुर, धौलपुर तथा करौली क्षेत्रमथुरा
6शाल्व जनपदअलवर
7पौण्ड्रेय जनपदश्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ का सीमांत क्षेत्र
8अर्जुनायन जनपदअलवर, भरतपुर के आस-पास का क्षेत्र
9राज्य जनपदभरतपुर

अभ्यास हेतु बहुविकल्पात्मक प्रश्न

1. कालीबंगा में उत्खनन के कौन-से स्तर से पूर्व हड़प्पा कालीन अवशेष प्राप्त हुए?
(a) द्वितीय
(b) तृतीय
(c) चतुर्थ
(d) पंचम

सही उत्तर: (a) द्वितीय

2. निम्नलिखित में से कौन-सा सभ्यता स्थल श्रीगंगानगर में स्थित नहीं है?
(a) बरोर
(b) चक-64
(c) बैराठ
(d) तरखान वाला डेरा

सही उत्तर: (c) बैराठ

3. रोमन एम्फोरा के मृद्भांड कहाँ से प्राप्त हुए?
(a) जुनाखेड़ा
(b) ईसवाल
(c) भीनमाल
(d) चन्द्रावती

सही उत्तर: (c) भीनमाल

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राजस्थान के इतिहास की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ – कालीबंगा, आहड़, बैराठ, महाजनपद

राजस्थान के इतिहास की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ

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